श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 31

 
श्लोक
हतेषु मल्लवर्येषु विद्रुतेषु च भोजराट् ।
न्यवारयत् स्वतूर्याणि वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
हतेषु—मारे गये; मल्ल-वर्येषु—श्रेष्ठ पहलवान; विद्रुतेषु—भगे हुए; च—तथा; भोज-राट्—भोजराज, कंस ने; न्यवारयत्— रोका; स्व—अपना; तूर्याणि—तुरहियाँ; वाक्यम्—शब्द; च—तथा; इदम्—यह; उवाच ह—कहा ।.
 
अनुवाद
 
 जब भोजराज ने देखा कि उसके सर्वश्रेष्ठ पहलवान या तो मारे जा चुके हैं अथवा भाग गये हैं, तो उसने वाद्य-यंत्रों को बजाना रूकवा दिया जो मूलत: उसके मनोविनोद के लिए बजाये जा रहे थे और इस प्रकार के शब्द कहे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥