श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 38

 
श्लोक
तं सम्परेतं विचकर्ष भूमौहरिर्यथेभं जगतो विपश्यत: ।
हाहेति शब्द: सुमहांस्तदाभू-दुदीरित: सर्वजनैर्नरेन्द्र ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको; सम्परेतम्—मृत; विचकर्ष—घसीटा; भूमौ—पृथ्वी पर; हरि:—सिंह; यथा—जिस तरह; इभम्—हाथी को; जगत:—सारे लोगों के; विपश्यत:—देखते देखते; हा हा इति—“हाय हाय” इस प्रकार; शब्द:—ध्वनि; सु-महान्—विशाल; तदा—तब; अभूत्—उठी; उदीरित:—बोला गया; सर्व-जनै:—सभी लोगों के द्वारा; नर-इन्द्र—हे मनुष्यों के शासक (राजा परीक्षित) ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह सिंह मृत हाथी को घसीटता है उसी तरह भगवान् ने वहाँ पर उपस्थित सारे लोगों के समक्ष जमीन पर कंस के मृत शरीर को घसीटा। हे राजन्, अखाड़े के सारे लोग तुमुल स्वर में “हाय हाय” चिल्ला उठे।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बतलाते हैं कि दर्शकों में से अनेक लोगों ने सोचा कि उच्च मंच से फेंके जाने से कंस केवल मूर्छित हुआ है। इसलिए भगवान् कृष्ण उसके शव को घसीटने लगे जिससे सारे लोग जान लें कि वह दुष्ट राजा मर चुका है। इस तरह हा हा सम्बोधन सूचित करता है कि लोग कितने चकित थे कि राजा सहसा मर गया है।
दर्शकों के आश्चर्य का उल्लेख विष्णु पुराण में भी मिलता है—

ततो हाहाकृतं सर्वमासीत् तद्रङ्गमण्डलम्।

अवज्ञया हतं दृष्ट्वा कृष्णेन मथुरेश्वरम् ॥

“जब लोगों ने देखा कि कृष्ण द्वारा मथुरा-पति अवज्ञापूर्वक मार डाला गया है, तो सारा अखाड़ा आश्चर्य की चीत्कार से भर गया।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥