श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 4

 
श्लोक
परिभ्रामणविक्षेपपरिरम्भावपातनै: ।
उत्सर्पणापसर्पणैश्चान्योन्यं प्रत्यरुन्धताम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
परिभ्रामण—एक-दूसरे के चारों ओर घूमते हुए; विक्षेप—धक्का देते; परिरम्भ—कुचलते; अवपातनै:—तथा नीचे गिराते हुए; उत्सर्पण—छोडक़र फिर दौडऩा; अपसर्पणै:—पीछे जाकर; च—तथा; अन्योन्यम्—एक-दूसरे को; प्रत्यरुन्धताम्—प्रतिरोध या बचाव करने लगे ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक कुश्ती लडऩे वाला अपने विपक्षी को खींचकर चक्कर लगवाता, धक्के देकर उसे नीचे गिरा देता (पटक देता) और उसके आगे तथा पीछे दौड़ता।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी बतलाते हैं कि परिरम्भ शब्द सूचित करता
है प्रतिपक्षी को बाहुओं के बीच में पकडक़र मसल देना।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥