श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 42

 
श्लोक
नेदुर्दुन्दुभयो व्योम्नि ब्रह्मेशाद्या विभूतय: ।
पुष्पै: किरन्तस्तं प्रीता: शशंसुर्ननृतु: स्त्रिय: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
नेदु:—बज उठीं; दुन्दुभय:—दुन्दुभियाँ; व्योम्नि—आकाश में; ब्रह्म-ईश-आद्या:—ब्रह्मा, शिव इत्यादि देवतागण; विभूतय:— अपने अंश; पुष्पै:—फूलों के द्वारा; किरन्त:—बिखेरते हुए; तम्—उस पर; प्रीता:—प्रसन्न; शशंसु:—उनकी प्रशंसा में गाना गाया; ननृतु:—नाचीं; स्त्रिय:—उनकी पत्नियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 जिस समय ब्रह्मा, शिव तथा भगवान् के अंश-रूप अन्य देवताओं ने हर्षित होकर उन पर फूलों की वर्षा की उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं। वे सभी उनका यश-गान करने लगे और उनकी पत्नियाँ नाचने लगीं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥