श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 44

 
श्लोक
शयानान्वीरशयायां पतीनालिङ्‌‌ग्य शोचती: ।
विलेपु: सुस्वरं नार्यो विसृजन्त्यो मुहु: शुच: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
शयानान्—लेटे हुए; वीर—वीर की; शयायाम्—शय्या पर (भूमि पर); पतीन्—अपने अपने पतियों को; आलिङ्ग्य— चूमकर; शोचती:—शोक का अनुभव करतीं; विलेपु:—विलाप करने लगीं; सु-स्वरम्—जोर-जोर से; नार्य:—स्त्रियाँ; विसृजन्त्य:—गिराती हुई; मुहु:—बारम्बार; शुच:—आँसू ।.
 
अनुवाद
 
 वीरों की मृत्यु शय्या पर लेटे अपने पतियों का आलिंगन करते हुए शोकमग्न स्त्रियाँ आँखों से निरन्तर अश्रु गिराती हुईं जोर-जोर से विलाप करने लगीं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥