श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 5

 
श्लोक
उत्थापनैरुन्नयनैश्चालनै: स्थापनैरपि ।
परस्परं जिगीषन्तावपचक्रतुरात्मन: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
उत्थापनै:—ऊपर उठा लेने से; उन्नयनै:—कंधे पर उठाने से; चालनै:—आगे धकेलने से; स्थापनै:—एक स्थान पर अटका देने से; अपि—भी; परस्परम्—एक-दूसरे को; जिगीषन्तौ—विजय चाहते हुए; अपचक्रतु:—हानि पहुँचाया; आत्मन:—अपने आप तक को ।.
 
अनुवाद
 
 एक-दूसरे को बलपूर्वक उठाकर, ले जाकर, धकेलकर तथा पकडक़र, कुश्ती लडऩे वाले विजय की महती आकांक्षा से अपने शरीरों को भी चोट पहुँचा बैठते।
 
तात्पर्य
 श्रील जीव गोस्वामी बतलाते हैं कि यद्यपि कृष्ण तथा बलराम ने निश्चय ही अपने शरीरों को चोट नहीं आने दी किन्तु चाणूर, मुष्टिक
तथा अन्य संसारी लोगों को उन्हें चोट लगती दिख रही थी। दूसरे शब्दों में, दोनों ही भाई कुश्ती की लीला में मग्न थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥