श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 7

 
श्लोक
महानयं बताधर्म एषां राजसभासदाम् ।
ये बलाबलवद्युद्धं राज्ञोऽन्विच्छन्ति पश्यत: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
महान्—महान; अयम्—यह; बत—हाय; अधर्म:—अधर्म का कार्य; एषाम्—इनके लिए; राज-सभा—राजा की सभा में; सदाम्—उपस्थित लोग; ये—जो; बल-अबल-वत्—बली तथा निर्बल के बीच; युद्धम्—युद्ध; राज्ञ:—जबकि राजा; अन्विच्छन्ति—वे भी चाहते हैं; पश्यत:—देख रहा है ।.
 
अनुवाद
 
 [स्त्रियों ने कहा] हाय! इस राजसभा के सदस्य यह कितना बड़ा अधर्म कर रहे हैं! जिस तरह राजा बलवान् तथा निर्बल के मध्य इस युद्ध को देख रहा है, वे भी उसी तरह इसे देखना चाहते हैं।
 
तात्पर्य
 स्त्रियाँ जो भाव व्यक्त कर रही हैं वह यह है कि यदि राजा किसी कारणवश ऐसी अन्यायपूर्ण प्रतियोगिता को देखना चाहता था, परंतु इस सभा के सम्मानित सदस्य उसे क्यों देखना चाह रहे हैं? ये भाव स्वाभाविक हैं। आज भी किसी सार्वजनिक
स्थान में जब हम किसी हृष्ट-पुष्ट, लम्बे- चौड़े व्यक्ति को किसी दुर्बल छोटे-से व्यक्ति से लड़ते देखते हैं, तो वितृष्णा उत्पन्न होती है। विशेष रूप से दयालु स्त्रियाँ ऐसी अनीतिपूर्ण हिंसा से तिलमिला उठती हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥