श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 9

 
श्लोक
धर्मव्यतिक्रमो ह्यस्य समाजस्य ध्रुवं भवेत् ।
यत्राधर्म: समुत्तिष्ठेन्न स्थेयं तत्र कर्हिचित् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म—धर्म का; व्यतिक्रम:—उल्लंघन; हि—निस्सन्देह; अस्य—इस; समाजस्य—समाज का; ध्रुवम्—निश्चित रूप से; भवेत्— होगा; यत्र—जिसमें; अधर्म:—अधर्म; समुत्तिष्ठेत्—पूरी तरह उदित हुआ है; न स्थेयम्—नहीं रहना चाहिए; तत्र—वहाँ; कर्हिचित्—क्षण-भर भी ।.
 
अनुवाद
 
 इस सभा में धर्म का निश्चय ही अति-क्रमण हो चुका है। जहाँ अधर्म पल रहा हो उस स्थान में एक पल भी नहीं रुकना चाहिए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥