श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में बतलाया गया है कि कृष्ण तथा बलराम ने किस तरह पहलवानों को मारा, कृष्ण ने किस तरह कंस को मारा और कैसे उसकी पत्नियों को ढाढ़स बँधाया और किस तरह दोनों भाई अपने माता-पिता से मिल सके।
कुश्ती लडऩे का निश्चय करके भगवान् कृष्ण चाणूर से भिड़ गये और भगवान् बलराम मुष्टिक से। वे बाँह से बाँह, सिर से सिर, घुटने से घुटना और छाती से छाती भिड़ा कर एक-दूसरे पर इतने कठोर प्रहार कर रहे थे कि ऐसा लगता था जैसे वे अपने शरीरों को भी क्षति पहुँचा रहे हों। अखाड़े में उपस्थित स्त्रियाँ इस भयंकर कुश्ती को देखकर राजा की तथा सारी सभा के सदस्यों की भर्त्सना यह कहकर करने लगीं, “सम्माननीय दर्शकों को कभी भी ऐसी कुश्ती-प्रतियोगिता की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी जिसमें वज्र जैसे देहधारी बड़े बड़े पहलवान ऐसे सुकुमार बालकों से जो युवावस्था में अभी पग धर रहे हों, लडऩे जा रहे हों। किसी भी बुद्धिमान मनुष्य को ऐसी किसी सभा में प्रवेश नहीं करना चाहिए जहाँ उसे अन्याय होता दिखाई दे।” चूँकि वसुदेव तथा देवकी को कृष्ण तथा बलराम की शक्ति का पूरा-पूरा पता न था अत:जब उन्होंने स्त्रियों को इस तरह बातें करते सुना तो वे अत्यन्त दुखी हो उठे।

तब श्रीकृष्ण ने चाणूर की बाँहें पकडक़र कई बार घुमाकर जमीन पर पटक दिया जिससे वह मर गया। मुष्टिक का भी ऐसा ही अन्त हुआ—वह भगवान् बलराम की हथेली की जोरदार चोट खाकर रक्त वमन करता हुआ पृथ्वी पर गिरकर मर गया। तत्पश्चात् कूट, शल तथा तोशल नामक पहलवान आगे बढ़े किन्तु कृष्ण तथा बलराम ने मुक्कों तथा पाँवों से उन सबका वध कर दिया। जो पहलवान बचे रहे वे अपनी जान बचाकर भाग निकले।

कंस के अतिरिक्त वहाँ उपस्थित सबों ने कृष्ण तथा बलराम की जय-जयकार की। क्रुद्ध होकर कंस ने बज रहे बाजे को रोक दिया और आदेश दिया कि वसुदेव, नन्द, उग्रसेन तथा सारे ग्वालों को कठोर दण्ड दिया जाय तथा कृष्ण तथा बलराम को सभा से खदेड़ दिया जाय। जब कृष्ण ने सुना कि कंस इस तरह बोल रहा है, तो वे अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और वे तुरन्त उच्च राजमंच पर कूद पड़े। उन्होंने कंस के बालों को पकड़ लिया और अखाड़े की फर्श पर पटक कर उसके ऊपर चढ़ गये। इस तरह कंस की मृत्यु हो गई। चूँकि कंस भयवश सदैव कृष्ण का स्मरण करता था अत: मृत्यु के बाद उसे सारूप्य मुक्ति प्राप्त हुई।

तब कंस के आठ भाइयों ने कृष्ण पर धावा बोल दिया किन्तु बलराम ने उन सबों को अपनी गदा से उसी तरह मार डाला जिस तरह सिंह निरीह पशुओं को मार डालता है। जब हर्षित देवों ने कृष्ण तथा बलराम पर फूलों की वर्षा की और उनके गुणों का कीर्तन करना शुरू किया, तो नगाड़ों की ध्वनि आकाश को गुँजा रही थी।

अपने पति के लिए शोक करती कंस-पत्नियाँ पछता रही थीं कि अन्य जीवों के प्रति हिंसा तथा समस्त ब्रह्माण्ड के सर्जक, पालनकर्ता तथा संहारकर्ता कृष्ण के प्रति अनादर के कारण ही कंस को इस तरह मरना पड़ा। भगवान् ने इन विधवाओं को ढाढ़स बँधाया, कंस तथा उसके भाइयों का दाह-संस्कार कराया और तब अपने माता-पिता को बन्दी-गृह से मुक्त किया। कृष्ण ने उनके चरणों को नमस्कार किया किन्तु वे अब समझ गये कि कृष्ण भगवान् हैं अत: उन्होंने उनका आलिंगन नहीं किया।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥