श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  » 
 
 
 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में बतलाया गया है कि किस तरह भगवान् श्रीकृष्ण के आदेश से उद्धव ने गोपियों को भगवान् का सन्देश दिया, उन्हें ढाढ़स बँधाया और फिर मथुरा लौट गये। जब व्रज...
 
श्लोक 1-2:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : व्रज की ललनाएँ कृष्ण के अनुचर को देखकर चकित हो गईं। उसके हाथ लम्बे लम्बे थे और आँखें नये खिले कमल जैसी थीं। वह पीत वस्त्र धारण किये था, गले में कमल की माला थी तथा अत्यन्त परिष्कृत किये हुए कुण्डलों से चमकता उसका मुखमण्डल कमल जैसा था। गोपियों ने पूछा, “यह सुन्दर पुरुष कौन है? यह कहाँ से आया है? यह किसकी सेवा करता है? यह तो कृष्ण के वस्त्र और आभूषण पहने है!” यह कहकर गोपियाँ उद्धव के चारों ओर उत्सुकता से एकत्र हो गईं जिनका आश्रय भगवान् उत्तमश्लोक श्रीकृष्ण के चरणकमल थे।
 
श्लोक 3:  विनयपूर्वक अपना शीश झुकाते हुए गोपियों ने अपनी लजीली मुसकराती चितवनों तथा मधुर शब्दों से उद्धव का उचित रीति से सम्मान किया। वे उन्हें एकान्त स्थान में ले गईं, उन्हें आराम से बैठाया और तब उन्हें लक्ष्मीपति कृष्ण का सन्देशवाहक मान कर उनसे प्रश्न करने लगीं।
 
श्लोक 4:  [गोपियों ने कहा] : हम जानती हैं कि आप यदुश्रेष्ठ कृष्ण के निजी पार्षद हैं और अपने उस श्रेष्ठ स्वामी के आदेश से यहाँ आये हैं, जो अपने माता-पिता को सुख प्रदान करने के इच्छुक हैं।
 
श्लोक 5:  अन्यथा हमें और कुछ भी ऐसा नहीं दीखता जिसे वे व्रज के इन चरागाहों में स्मरणीय समझते होंगे। निस्सन्देह एक मुनि के लिए भी अपने पारिवारिक जनों का स्नेह-बंधन तोड़ पाना कठिन होता है।
 
श्लोक 6:  किसी अन्य के प्रति, जो पारिवारिक सदस्य नहीं है, दिखलाई जाने वाली मित्रता स्वार्थ से प्रेरित होती है। अत: यह तो एक बहाना होता है, जो तब तक चलता है जबतक किसी का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता। ऐसी मित्रता वैसी ही है, जिस तरह कि स्त्रियों के प्रति पुरुषों की या फूलों के प्रति भौंरों की रुचि।
 
श्लोक 7:  वेश्याएँ निर्धन व्यक्ति को, प्रजा अयोग्य राजा को, शिक्षा पूरी होने पर विद्यार्थी अपने शिक्षक को तथा पुरोहितगण दक्षिणा पाने के बाद यज्ञ करने वाले व्यक्ति को छोड़ जाते हैं।
 
श्लोक 8:  फल न रहने पर पक्षी वृक्ष को, भोजन करने के बाद अतिथि घर को, जंगल जल जाने पर पशु जंगल को तथा प्रेमी के प्रति आकृष्ट रहने के बावजूद भी स्त्री का भोग कर लेने पर प्रेमी उसका परित्याग कर देते हैं।
 
श्लोक 9-10:  इस तरह बोलती हुई गोपियों ने जिनके वचन, शरीर तथा मन भगवान् गोविन्द के प्रति पूर्णतया समर्पित थे, अपना नैत्यिक कार्य करना छोड़ दिया क्योंकि अब कृष्णदूत श्री उद्धव उनके बीच आया था। वे अपने प्रिय कृष्ण के बाल्यकाल तथा किशोरावस्था की लीलाओं का अविरत स्मरण करके उनका गुणगान करने लगीं और लाज छोडक़र फूट-फूटकर रोने लगीं।
 
श्लोक 11:  कोई एक गोपी जब कृष्ण के साथ अपने पूर्व सान्निध्य का ध्यान कर रही थी, तो उसने अपने सामने एक भौंरा देखा और उसे लगा कि यह उसके प्रियतम द्वारा भेजा गया कोई दूत है। अत: वह इस प्रकार बोली।
 
श्लोक 12:  गोपी ने कहा : हे भौंरे, हे छलिये के मित्र, अपनी उन मूछों से मेरे पाँवों को मत छूना जो उस कुंकुम से लेपित हैं, जो कृष्ण की माला में तब लग जाता था जब वह मेरी सौत के स्तनों द्वारा मर्दित होती थी। कृष्ण अब मथुरा की स्त्रियों को तुष्ट करें। जो व्यक्ति तुम जैसे दूत को भेजेगा वह यदुओं की सभा में निश्चित रूप से उपहास का पात्र बनेगा।
 
श्लोक 13:  केवल एक बार अपने होठों का मोहक अमृत पिलाकर कृष्ण ने सहसा उसी तरह हमारा परित्याग कर दिया है, जिस तरह तुम किसी फूल को तुरन्त छोड़ देते हो। तो फिर यह कैसे सम्भव है कि देवी पद्मा स्वेच्छा से उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं? हाय! इसका उत्तर यही हो सकता है कि उनका चित्त उनके छलपूर्ण शब्दों द्वारा चुरा लिया गया है।
 
श्लोक 14:  हे भौंरे, तुम घर-बार से रहित हम लोगों के समक्ष यदुओं के स्वामी के विषय में इतना अधिक क्यों गाये जा रहे हो? ये कथाएँ हमारे लिए अब पुरानी हो चुकी हैं। अच्छा हो कि तुम अर्जुन के उस मित्र के विषय में उसकी उन नई सखियों के समक्ष जाकर गाओ जिनके स्तनों की दाहक इच्छा(कामेच्छा) को उसने शान्त कर दिया है। वे स्त्रियाँ अवश्य ही तुम्हें मनवांछित भिक्षा-दान देंगी।
 
श्लोक 15:  उन्हें स्वर्ग, पृथ्वी या पाताल में कौन-सी स्त्रियाँ अनुपलब्ध हैं? वे केवल अपनी भौंहों को तिरकी करके छलपूर्ण आकर्षण से हँसते हैं, तो वे सब उनकी हो जाती हैं। लक्ष्मीजी तक उनके चरण-रज की पूजा करती हैं, तो उनकी तुलना में हमारी क्या बिसात है? किन्तु जो दीन दुखियारी हैं, वे कम से कम उनका उत्तमश्लोक नाम तो ले ही सकती हैं!
 
श्लोक 16:  तुम अपने सिर को मेरे पैरों से दूर ही रखो। मुझे पता है कि तुम क्या कर रहे हो। तुमने बहुत ही दक्षतापूर्वक मुकुन्द से कूटनीति सीखी है और अब चापलूसी भरे शब्द लेकर उनके दूत बनकर आये हो। किन्तु उन्होंने तो उन बेचारियों को ही छोड़ दिया है जिन्होंने उनके लिए अपने बच्चों, पतियों तथा अन्य सम्बन्धियों का परित्याग किया है। वे निपट कृतघ्न हैं। तो मैं अब उनसे समझौता क्यों करूँ?
 
श्लोक 17:  शिकारी की तरह उन्होंने कपिराज को बाणों से निर्दयतापूर्वक बींध दिया। चूँकि वे एक स्त्री द्वारा जीते जा चुके थे इसलिए उन्होंने एक दूसरी स्त्री को, जो उनके पास कामेच्छा से आई थी कुरूप कर दिया। यही नहीं, बलि महाराज की बलि खाकर भी उन्होंने उन्हें रस्सियों से बाँध दिया मानो वे कोई कौवा हों। अत: हमें इस श्यामवर्ण वाले लडक़े से सारी मित्रता छोड़ देनी चाहिए भले ही हम उसके विषय में बातें करना बन्द न कर पायें।
 
श्लोक 18:  कृष्ण द्वारा नियमित रूप से की जाने वाली लीलाओं के विषय में सुनना कानों के लिए अमृत के समान है। जो लोग इस अमृत की एक बूँद का एक बार भी आस्वादन करते हैं, उनकी भौतिक द्वैत के प्रति अनुरक्ति विनष्ट हो जाती है। ऐसे अनेक लोगों ने एकाएक अपने भाग्यहीन घरों तथा परिवारों को त्याग दिया है और वे स्वयं दीन बनकर पक्षियों की तरह इधर-उधर घूमते फिरते हुए जीवन-निर्वाह के लिए भीख माँग-माँग कर वृन्दावन आये हैं।
 
श्लोक 19:  उनके छलपूर्ण शब्दों को सच मानकर हम उस काले हिरन की मूर्ख पत्नियों के समान बन गईं जो निष्ठुर शिकारी के गीत में भरोसा कर बैठती हैं। इस तरह हम उनके नाखुनों के स्पर्श से उत्पन्न काम की तीव्र पीड़ा का बारम्बार अनुभव करती रहीं। हे दूत, अब कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई बात कहो।
 
श्लोक 20:  हे मेरे प्रियतम के मित्र, क्या मेरे प्रेमी ने फिर से तुम्हें यहाँ भेजा है? हे मित्र, मुझे तुम्हारा सम्मान करना चाहिए, अत: जो चाहो वर माँग सकते हो। किन्तु तुम हमें उसके पास फिर से ले जाने के लिए यहाँ क्यों आये हो जिसके मधुर प्रेम को छोड़ पाना इतना कठिन है? कुछ भी हो, हे भद्र भौंरे, उनकी प्रेयसी तो लक्ष्मीजी हैं और वे उनके साथ सदैव ही उनके वक्षस्थल पर विराजमान रहती हैं।
 
श्लोक 21:  हे उद्धव, दरअसल यह बहुत ही खेदजनक है कि कृष्ण मथुरा में वास करते हैं। क्या वे अपने पिता के गृहकार्यों तथा अपने ग्वालबाल मित्रों की याद करते हैं? हे महात्मा, क्या वे कभी अपनी इन दासियों की भी बातें चलाते हैं? वे कब अपने अगुरु-सुगन्धित हाथ को हमारे सिरों पर रखेंगे?
 
श्लोक 22:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह सुनकर उद्धव ने गोपियों को ढाढ़स बँधाने का प्रयास किया जो कृष्ण का दर्शन पाने के लिए अत्यन्त लालायित थीं। इस तरह वे उनके प्रेमी का सन्देश उनसे बताने लगे।
 
श्लोक 23:  श्री उद्धव ने कहा : निश्चय ही तुम सारी गोपियाँ सभी प्रकार से सफल हो और विश्व-भर में पूजित हो क्योंकि तुमने इस तरह से भगवान् वासुदेव में अपने मन को समर्पित कर रखा है।
 
श्लोक 24:  दान, कठिन व्रत, तपस्या, अग्नि यज्ञ, जप, वैदिक ग्रंथों का अध्ययन, विधि-विधानों का पालन तथा अन्य अनेक शुभ साधनों द्वारा भगवान् कृष्ण की भक्ति प्राप्त की जाती है।
 
श्लोक 25:  अपने सौभाग्य से तुम सबों ने भगवान् उत्तमश्लोक के प्रति शुद्ध-भक्ति का अद्वितीय मानदण्ड स्थापित किया है—यह मानदण्ड ऐसा है, जिसे मुनि भी कठिनाई से प्राप्त कर सकते हैं।
 
श्लोक 26:  सौभाग्य से तुम लोगों ने अपने पुत्रों, पतियों, शारीरिक सुविधाओं, सम्बन्धियों तथा घरों का परित्याग उस परम पुरुष के लिए किया है, जो कृष्ण नाम से जाना जाता है।
 
श्लोक 27:  हे परम भाग्यशालिनी गोपियो, तुम लोगों ने दिव्य स्वामी के लिए अनन्य प्रेम का अधिकार ठीक ही प्राप्त किया है। निस्सन्देह, कृष्ण के विरह में उनके प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करके तुम लोगों ने मुझ पर महती कृपा दिखलाई है।
 
श्लोक 28:  हे भद्र-देवियो, अब तुम सब अपने प्रेमी का सन्देश सुनो जिसे अपने स्वामी का विश्वसनीय दास होने से मैं तुम लोगों के पास लेकर आया हूँ।
 
श्लोक 29:  भगवान् ने कहा है, “तुम वास्तव में कभी भी मुझसे विलग नहीं हो क्योंकि मैं सारी सृष्टि का आत्मा हूँ। जिस तरह प्रकृति के तत्त्व—आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी—प्रत्येक सृजित वस्तु में उपस्थित रहते हैं उसी तरह मैं हर एक के मन, प्राण तथा इन्द्रियों में और भौतिक तत्त्वों के भीतर तथा प्रकृति के गुणों में उपस्थित रहता हूँ।
 
श्लोक 30:  मैं ही अपनी निजी शक्ति के द्वारा भौतिक तत्त्वों, इन्द्रियों तथा प्रकृति के गुणों का सृजन करता हूँ, उन्हें बनाये रखता हूँ और फिर अपने भीतर समेट लेता हूँ।
 
श्लोक 31:  शुद्ध चेतना या ज्ञान से युक्त होने से आत्मा प्रत्येक भौतिक वस्तु से पृथक् है और प्रकृति के गुणों के पाश से अलिप्त है। आत्मा का अनुभव भौतिक प्रकृति के तीन कार्यों के माध्यम से किया जा सकता है—ये हैं जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति।
 
श्लोक 32:  जिस तरह तुरन्त का जगा हुआ व्यक्ति स्वप्न के विषय में सोचता रह सकता है यद्यपि वह भ्रामक होता है उसी तरह मन के द्वारा मनुष्य इन्द्रियविषयों का ध्यान करता है जिन्हें बाद में इन्द्रियाँ प्राप्त कर सकती हैं। इसलिए मनुष्य को पूर्णतया सतर्क रहना चाहिए और मन को वश में लाना चाहिए।
 
श्लोक 33:  बुद्धिमान अधिकारी जनों के अनुसार यही सारे वेदों तथा योगाभ्यास, सांख्य, त्याग, तपस्या, इन्द्रिय संयम तथा सचाई का चरम निष्कर्ष है, जिस तरह कि सारी नदियों का चरम गन्तव्य समुद्र है।
 
श्लोक 34:  किन्तु जिस असली कारण से तुम सबों की आँखों की प्रिय वस्तुरुप, मैं, तुम लोगों से अति दूर रह रहा हूँ, वह यह है कि मैं अपने प्रति तुम सबों के चिंतन को प्रगाढ़ करना चाहता था और इस तरह तुम्हारे मनों को अपने अधिक निकट लाना चाहता था।
 
श्लोक 35:  जब प्रेमी दूर होता है, तो स्त्री उसके विषय में अधिक सोचती है बजाय इसके कि जब वह उसके समक्ष उपस्थित होता है।
 
श्लोक 36:  चूँकि तुम्हारे मन पूर्णतया मुझमें लीन रहते हैं और अन्य सारे कार्यों से मुक्त रहते हैं, तुम सदैव मेरा स्मरण करती हो और इसीलिए तुम लोग शीघ्र ही मुझे पुन: अपने सामने पा सकोगी।
 
श्लोक 37:  यद्यपि कुछ गोपियों को ग्वाल-ग्राम में ही रह जाना पड़ा था जिससे वे रात में जंगल में रचाये गये रास-नृत्य में मेरे साथ क्रीड़ा नहीं कर पाईं, तो भी वे परम भाग्यशालिनी थीं। दरअसल वे मेरी शक्तिशाली लीलाओं का ध्यान करके ही मुझे प्राप्त कर सकीं।
 
श्लोक 38:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : व्रज की स्त्रियाँ अपने प्रियतम कृष्ण से यह सन्देशा सुनकर प्रसन्न हुईं। उनके शब्दों से उनकी स्मृतियाँ ताजी हो गईं अत: उन्होंने उद्धव से इस प्रकार कहा।
 
श्लोक 39:  गोपियों ने कहा : यह अच्छी बात है कि यदुओं का शत्रु एवं उन्हें सताने वाला कंस अब अपने अनुयायियों सहित मारा जा चुका है। और यह भी अच्छी बात है कि भगवान् अच्युत अपने शुभैषी मित्रों तथा सम्बन्धियों के साथ सुखपूर्वक रह रहे हैं जिनकी हर इच्छा अब पूरी हो रही है।
 
श्लोक 40:  हे भद्र उद्धव, क्या गद का बड़ा भाई नगर की स्त्रियों को वह आनन्द प्रदान कर रहा है, जो वास्तव में हमारा है? हम ऐसा समझती हैं कि वे स्त्रियाँ उदार चितवनों तथा प्यारी लजीली मुसकानों से उनकी पूजा करती होंगी।
 
श्लोक 41:  श्रीकृष्ण सभी प्रकार के माधुर्य व्यापार में दक्ष हैं और नगर की स्त्रियों के प्रिय हैं। चूँकि अब वे उनके मोहक शब्दों तथा इशारों से निरन्तर पूजित हैं, तो भला फिर वे उनके पाश में क्योंकर नहीं बँधेंगे?
 
श्लोक 42:  हे साधु-पुरुष, नगर की स्त्रियों से बातचीत के दौरान क्या गोविन्द कभी हमारी याद करते हैं? क्या वे उनसे खुल कर वार्ता करते समय कभी हम ग्रामीण बालाओं का भी स्मरण करते हैं?
 
श्लोक 43:  क्या वे वृन्दावन के जंगल में उन रातों का स्मरण करते हैं, जो कमल, चमेली तथा प्रकाशमान चन्द्रमा से सुन्दर लगती थीं? जब हम उनकी मनमोहिनी लीलाओं का गुणगान करतीं तो वे रास-नृत्य के घेरे में जो कि घुँघरुओं के संगीत से गुंजायमान होता था, हम प्रेयसियों के साथ आनन्द विहार करते थे।
 
श्लोक 44:  क्या वह दाशार्ह वंशज यहाँ फिर से आयेगा और अपने अंगों के स्पर्श से उन सबों को फिर से जिलायेगा जो अब उन्हीं के द्वारा उत्पन्न किए गए शोक से जल रहे हैं? क्या वह हमें उसी प्रकार बचा लेगा जिस तरह भगवान् इन्द्र जलधारी बादलों से जंगल को पुन: जीवनदान देते हैं?
 
श्लोक 45:  भला राज्य जीत लेने, अपने शत्रुओं का वध कर लेने और राजाओं की पुत्रियों के साथ विवाह कर लेने के बाद कृष्ण यहाँ क्यों आने लगे? वे वहाँ अपने सारे मित्रों तथा शुभचिन्तकों से घिरेरहकर प्रसन्न हैं।
 
श्लोक 46:  महापुरुष कृष्ण लक्ष्मी के स्वामी हैं और वे जो भी चाहते हैं वह स्वत: पा लेते हैं। जब वे अपने में पहले से पूर्ण हैं, तो हम वनवासिनियाँ या अन्य स्त्रियाँ उनके प्रयोजन को कैसे पूरा कर सकती हैं?
 
श्लोक 47:  दरअसल सर्वोच्च सुख तो समस्त इच्छाओं का परित्याग करने में है जैसा कि पिंगला नामक वेश्या तक ने भी कहा है। यह जानते हुए भी हम कृष्ण को पाने की अपनी आशाएँ नहीं छोड़ सकतीं।
 
श्लोक 48:  भला भगवान् कृष्ण से घुल-मिल कर बातें करने को छोड़ पाना कौन सहन कर सकता है? यद्यपि वे श्रीदेवी में तनिक भी रुचि नहीं दर्शाते किन्तु वे उनके वक्षस्थल पर बने स्थान से कभी इधर-उधर नहीं होती।
 
श्लोक 49:  हे उद्धव प्रभु, जब यहाँ कृष्ण बलराम के साथ थे तो वे इन सारी नदियों, पर्वतों, जंगलों, गौवों तथा वंशी की ध्वनियों का आनन्द लिया करते थे।
 
श्लोक 50:  ये सब हमें नन्द के पुत्र की सदैव याद दिलाते हैं। निस्सन्देह चूँकि हम दैवी-चिन्हों से अंकित कृष्ण के चरण-चिन्हों को देखती हैं अत: हम उन्हें कभी भी नहीं भुला सकतीं।
 
श्लोक 51:  हे उद्धव, हम उन्हें कैसे भुला सकती हैं जब उनकी मनोहर चाल, उनकी उदार हँसी, चपल चितवनों एवं मधुर शब्दों से हमारे चित्त चुराये जा चुके हैं?
 
श्लोक 52:  हे नाथ, हे रमानाथ, हे व्रजनाथ! हे समस्त कष्टों के विनाशक गोविन्द! कृपया अपने गोकुल को व्यथा के उस सागर से उबार लें, जिसमें वह डूबा जा रहा है।
 
श्लोक 53:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कृष्ण के सन्देशों से विरह का ज्वर हट जाने पर गोपियों ने उद्धव को अपने प्रभु कृष्ण से अभिन्न जान कर, उनकी पूजा की।
 
श्लोक 54:  उद्धव वहाँ पर कृष्ण की लीलाओं की कथाएँ कहकर गोपियों का दुख दूर करते हुए कई महीनों तक रहे। इस तरह वे सभी गोकुलवासियों के लिए आनन्द ले आये।
 
श्लोक 55:  उद्धव जितने दिनों तक नन्द के व्रज ग्राम में रहे वे सारे दिन व्रजवासियों को एक क्षण के तुल्य प्रतीत हुए क्योंकि उद्धव सदा कृष्ण की वार्ताएँ करते रहते थे।
 
श्लोक 56:  हरि के दास (उद्धव) ने व्रज की नदियों, जंगलों, पर्वतों, घाटियों तथा पुष्पित वृक्षों को देख देखकर और भगवान् कृष्ण के विषय में स्मरण करा-कराकर वृन्दावनवासियों को प्रेरणा देने में आनन्द का अनुभव किया।
 
श्लोक 57:  इस तरह यह देखकर कि गोपियाँ किस तरह कृष्ण में पूर्णतया तल्लीन रहने से सदैव विक्षुब्ध रहती हैं, उद्धव अत्यधिक प्रसन्न थे। उन्हें नमस्कार करने की इच्छा से उन्होंने यह गीत गाया।
 
श्लोक 58:  [उद्धव ने गाया] : पृथ्वी के समस्त व्यक्तियों में ये गोपियाँ ही वास्तव में अपने देहधारी जीवनों को सफल बना पाई हैं क्योंकि इन्होंने भगवान् गोविन्द के लिए शुद्ध प्रेम की पूर्णता प्राप्त कर ली है। इस संसार से डरने वालों, बड़े-बड़े मुनियों तथा हम सबों को इनके शुद्ध प्रेम की लालसा बनी रहती है। जिसने अनन्त भगवान् की कथाओं का आस्वाद कर लिया है उसके लिए उच्च ब्राह्मण के रूप में या साक्षात् ब्रह्मा के रूप में भी जन्म लेने से क्या लाभ?
 
श्लोक 59:  यह कितना आश्चर्यजनक है कि जंगल में विचरण करने वाली एवं अनुपयुक्त आचरण के कारण दूषित सी प्रतीत होने वाली इन सीधी-सादी स्त्रियों ने परमात्मा कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम की पूर्णता प्राप्त कर ली है। तो भी यह सच है कि भगवान् एक अज्ञानी पूजक को भी अपना आशीर्वाद देते हैं जिस प्रकार कि अज्ञानी व्यक्ति द्वारा किसी उत्तम औषधि के अवयवों से अनजान होते हुए पी लेने पर भी वह अपना प्रभाव दिखलाती है।
 
श्लोक 60:  जब श्रीकृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नाच रहे थे तो भगवान् की भुजाएँ गोपियों का आलिंगन कर रही थीं। यह दिव्य अनुग्रह न तो कभी लक्ष्मीजी को प्राप्त हुआ न वैकुण्ठ की ललनाओं (अंगनाओं) को। निस्सन्देह कमल के फूल जैसी शारीरिक कान्ति तथा सुगंध से युक्त स्वर्गलोक की सबसे सुन्दर बालाओं ने भी कभी इस तरह की कल्पना तक नहीं की थी। तो फिर उन संसारी स्त्रियों के विषय में क्या कहा जाय जो भौतिक दृष्टि से अतीव सुन्दर हैं?
 
श्लोक 61:  वृन्दावन की गोपियों ने अपने पतियों, पुत्रों तथा अन्य परिवार वालों का साथ त्याग दिया है जिनको त्याग पाना अतीव कठिन होता है। उन्होंने मुकुन्द कृष्ण के चरणकमलों की शरण पाने के लिए सतीत्व मार्ग का परित्याग कर दिया है, जिसे वैदिक ज्ञान द्वारा खोजा जाता है। ओह! मैं वृन्दावन की इन झाडिय़ों, लताओं तथा जड़ी-बूटियों में से कोई एक भी होने का सौभाग्य प्राप्त करूँ क्योंकि गोपियाँ उन्हें अपने चरणों से रौंदती हैं और अपने चरणकमलों की धूल से उन्हें आशीर्वाद देती हैं।
 
श्लोक 62:  स्वयं लक्ष्मीजी तथा ब्रह्मा एवं अन्य सारे देवता जो योग सिद्धि के स्वामी हैं, भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की पूजा अपने मन के भीतर ही कर सकते हैं। किन्तु रास-नृत्य के समय कृष्ण ने तो इन गोपियों के स्तनों पर अपने चरण रखे और गोपियों ने उन्हीं चरणों का आलिंगन करके सारी व्यथाएँ त्याग दी।
 
श्लोक 63:  मैं नन्द महाराज के गोप-ग्राम की स्त्रियों की चरण-रज की बारम्बार वन्दना करता हूँ। जब ये गोपियाँ श्रीकृष्ण के यश का जोर जोर से कीर्तन करती हैं, तो वह ध्वनि तीनों लोकों को पवित्र कर देती है।
 
श्लोक 64:  शुकदेव गोस्वमी ने कहा : तत्पश्चात् दशार्हवंशी उद्धव ने गोपियों तथा माता यशोदा एवं नन्द महाराज से विदा होने की अनुमति ली। उन्होंने सारे ग्वालों से विदा ली और प्रस्थान करने के लिए वे अपने रथ पर सवार हो गये।
 
श्लोक 65:  जब उद्धव प्रस्थान करने वाले थे तो नन्द तथा अन्य लोग पूजा की विविध वस्तुएँ लेकर उनके पास पहुँचे। उन लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया।
 
श्लोक 66:  [नन्द तथा अन्य ग्वालों ने कहा] : हमारे मानसिक कार्य सदैव कृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण करें, हमारे शब्द सदैव उन्हीं के नामों का कीर्तन करें और हमारे शरीर सदैव उन्हीं को नमस्कार करें तथा उनकी ही सेवा करें।
 
श्लोक 67:  भगवान् की इच्छा से हमें अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप इस संसार में जहाँ भी घूमना पड़े हमारे सत्कर्म तथा दान हमें सदा भगवान् कृष्ण का प्रेम प्रदान करें।
 
श्लोक 68:  [शुकदेव गोस्वामी ने कहा] : हे नृपति, इस तरह कृष्ण के प्रति भक्ति की अभिव्यक्ति द्वारा ग्वालों से सम्मानित होकर उद्धव मथुरा नगरी वापस चले गये जो कृष्ण के संरक्षण में थी।
 
श्लोक 69:  गिर कर प्रणाम करने के बाद उद्धव ने कृष्ण से व्रजवासियों की महती भक्ति का वर्णन किया। उद्धव ने इसका वर्णन वसुदेव, बलराम तथा राजा उग्रसेन से भी किया और उन्हें वे वस्तुएँ भेंट कीं जिन्हें वे अपने साथ लाये थे।
 
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