श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 5: नन्द महाराज तथा वसुदेव की भेंट  »  श्लोक 23

 
श्लोक
दिष्टय‍ा भ्रात: प्रवयस इदानीमप्रजस्य ते ।
प्रजाशाया निवृत्तस्य प्रजा यत् समपद्यत ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
दिष्ट्या—सौभाग्यवश; भ्रात:—हे भाई; प्रवयस:—अधिक आयु वाले आपका; इदानीम्—इस समय; अप्रजस्य—सन्तानहीन का; ते—आपका; प्रजा-आशाया: निवृत्तस्य—जिसे इस अवस्था में पुत्र प्राप्ति की आशा न रह गई हो, उसका; प्रजा—पुत्र; यत्—जो भी; समपद्यत—भाग्यवश प्राप्त हो गया ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे भाई नन्द महाराज, इस वृद्धावस्था में भी आपका कोई पुत्र न था और आप निराश हो चुके थे। अत: अब जबकि आपको पुत्र प्राप्त हुआ है, तो यह अत्यधिक सौभाग्य का लक्षण है।
 
तात्पर्य
 सामान्यतया वृद्धावस्था में पुत्र उत्पन्न नहीं किया जा सकता। यदि भाग्यवश कोई सन्तान उत्पन्न भी हो तो वह लडक़ी होती है। इस तरह वसुदेव ने अप्रत्यक्ष रूप से नन्द महाराज से पूछा कि उन्हें पुत्र उत्पन्न हुआ है या पुत्री। वसुदेव जानते थे कि यशोदा को कन्या उत्पन्न हुई है, जिसे वे चुरा लाए थे और उसके स्थान में पुत्र छोड़
आए थे। यह एक बहुत बड़ा रहस्य था और वसुदेव जानना चाहते थे कि नन्द महाराज को पहले से इसका भान है अथवा नहीं। किन्तु पूछने पर उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि कृष्ण-जन्म तथा यशोदा की देखरेख में उनके छोड़े जाने का रहस्य अब भी गुप्त है। इससे किसी प्रकार का खतरा न था क्योंकि कंस को पता नहीं था कि इससे पहले क्या हो चुका है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥