श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 5: नन्द महाराज तथा वसुदेव की भेंट  »  श्लोक 26

 
श्लोक
कच्चित् पशव्यं निरुजं भूर्यम्बुतृणवीरुधम् ।
बृहद्वनं तदधुना यत्रास्से त्वं सुहृद्‌वृत: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
कच्चित्—चाहे; पशव्यम्—गौवों की सुरक्षा; निरुजम्—बिना कष्ट या रोग के; भूरि—पर्याप्त; अम्बु—जल; तृण—घास; वीरुधम्—पौधे; बृहत् वनम्—विशाल जंगल; तत्—ये सारे प्रबन्ध वहाँ हैं; अधुना—अब; यत्र—जहाँ; आस्से—रह रहे हैं; त्वम्—तुम, आप; सुहृत्-वृत:—मित्रों से घिरे हुए ।.
 
अनुवाद
 
 हे मित्र नन्द महाराज, आप जिस स्थान में रह रहे हैं क्या वहाँ का जंगल पशुओं-गौवों के लिए अनुकूल है? आशा है कि वहाँ रोग या कोई असुविधा नहीं होगी। वह स्थान जल, घास तथा अन्य पौधों से भरा-पुरा होगा।
 
तात्पर्य
 मानव सुख के लिए पशुओं, विशेष रूप से गौवों की देखभाल करनी चाहिए। इसीलिए वसुदेव ने पूछा कि क्या जहाँ नन्द महाराज रहते हैं वहाँ पशुओं के लिए अच्छा प्रबन्ध है? समुचित मानव सुख के लिए गौवों की रक्षा का प्रबन्ध होना चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि जंगल तथा घास और जल से पूर्ण पर्याप्त चरागाह होने चाहिए। यदि जानवर सुखी रहेंगे तो प्रचुर दूध मिलेगा जिससे मनुष्यों को तरह-तरह की वस्तुएँ प्राप्त हो सकेंगी जिनसे वे सुखपूर्वक जीवन बिता सकेंगे। भगवद्गीता
(१८.४४) में आदेश है—कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। भला पशुओं को समुचित सुविधाएँ प्रदान किए बिना मानव समाज किस तरह सुखी बन सकता है? यह बहुत बड़ा पाप है कि लोग कसाईघर चलाने के लिए पशु-पालन कर रहे हैं। इस आसुरी कृत्य से लोग वास्तविक मानव जीवन का अपना अवसर विनष्ट कर रहे हैं। चूँकि वे कृष्ण के उपदेशों को कोई महत्त्व नहीं दे रहे इसलिए उनकी तथाकथित सभ्यता की प्रगति पागलखाने के लोगों के पागलपूर्ण प्रयासों की तरह है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥