श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 10

 
श्लोक
पितृन् देवान् समभ्यर्च्य विप्रांश्च विधिवन्नृप ।
भोजयित्वा यथान्यायं वाचयामास मङ्गलम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
पितृन्—पूर्वजों; देवान्—देवतागण; समभ्यर्च्य—ठीक से पूजा की; विप्रान्—ब्राह्मणों को; च—तथा; विधि-वत्—विधि विधानों के अनुसार; नृप—हे राजा (परीक्षित); भोजयित्वा—भोजन कराकर; यथा—जिस तरह; न्यायम्—उचित है; वाचयाम् आस—उच्चारित किया था; मङ्गलम्—शुभ मंत्र ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, महाराज भीष्मक ने पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणों को भलीभाँति भोजन कराकर उनकी विधिवत पूजा की। तत्पश्चात् उसने दुलहन के मंगल के लिए परम्परागत मंत्रों का उच्चारण करवाया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥