श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 18-19

 
श्लोक
कृष्णरामद्विषो यत्ता: कन्यां चैद्याय साधितुम् ।
यद्यागत्य हरेत् कृष्णो रामाद्यैर्यदुभिर्वृत: ॥ १८ ॥
योत्स्याम: संहतास्तेन इति निश्चितमानसा: ।
आजग्मुर्भूभुज: सर्वे समग्रबलवाहना: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
कृष्ण-राम-द्विष:—कृष्ण तथा बलराम से द्वेष करने वालों ने; यत्ता:—तैयारी की; कन्याम्—दुलहन को; चैद्याय—शिशुपाल के लिए; साधितुम्—प्राप्त करने के लिए; यदि—यदि; आगत्य—आकर; हरेत्—हरण कर ली जाय; कृष्ण:—कृष्ण; राम— बलराम; आद्यै:—इत्यादि के द्वारा; यदुभि:—यादवों के; वृत:—साथ में; योत्स्याम:—हम युद्ध करेंगे; संहता:—साथ होकर; तेन—उसके साथ; इति—इस प्रकार; निश्चित-मानसा:—कृतसंकल्प; आजग्मु:—आये; भू-भुज:—राजा; सर्वे—सभी; समग्र—पूर्ण; बल—सैन्य-शक्ति; वाहना:—तथा वाहनों के साथ ।.
 
अनुवाद
 
 शिशुपाल को दुलहन दिलाने के लिए कृष्ण तथा बलराम से ईर्ष्या करने वाले राजाओं ने परस्पर यह निश्चय किया, “यह कृष्ण यदि बलराम तथा अन्य यदुओं के साथ दुलहन का अपहरण करने यहाँ आता है, तो हम सब मिलकर उससे युद्ध करेंगे।” अत: वे ईर्ष्यालु राजा अपनी सारी सेनाएँ तथा सारे सैन्य वाहन लेकर विवाह में गये।
 
तात्पर्य
 संहता: का सामान्य अर्थ “दृढ़ता से बँधा हुआ” होता है किन्तु इसका अर्थ “पूरी तरह पददलित या मारा गया” भी हो सकता है। इस तरह यद्यपि कृष्ण के शत्रु एकजुट
और बलशाली— संहता: पहले अर्थ में—थे किन्तु वे भगवान् का ठीक से मुकाबला नहीं कर पाये अत: वे पददलित होकर मारे जायेंगे—संहता: दूसरे अर्थ में।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥