श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 20-21

 
श्लोक
श्रुत्वैतद् भगवान् रामो विपक्षीयनृपोद्यमम् ।
कृष्णं चैकं गतं हर्तुं कन्यां कलहशङ्कित: ॥ २० ॥
बलेन महता सार्धं भ्रातृस्‍नेहपरिप्लुत: ।
त्वरित: कुण्डिनं प्रागाद् गजाश्वरथपत्तिभि: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
श्रुत्वा—सुनकर; एतत्—यह; भगवान् राम:—बलराम; विपक्षीय—शत्रुपक्ष के; नृप—राजाओं की; उद्यमम्—तैयारियाँ; कृष्णम्—कृष्ण को; च—तथा; एकम्—अकेला; गतम्—गया हुआ; हर्तुम्—हरण करने केलिए; कन्याम्—कन्या को; कलह—युद्ध की; शङ्कित:—आशंका से; बलेन—सेना; महता—विशाल; सार्धम्—साथ; भ्रातृ—अपने भाई के प्रति; स्नेह— स्नेह में; परिप्लुत:—निमग्न; त्वरित:—तुरन्त; कुण्डिनम्—कुण्डिन को; प्रागात्—गये; गज—हाथी; अश्व—घोड़े; रथ—रथ; पत्तिभि:—पैदल सेना सहित ।.
 
अनुवाद
 
 जब बलराम ने विपक्षी राजाओं की इन तैयारियों तथा कृष्ण द्वारा दुलहन का हरण करने के लिए अकेले ही प्रस्थान किये जाने के बारे में सुना तो उन्हें शंका होने लगी कि कहीं युद्ध न ठन जाय। अत: वे अपने भाई के स्नेह में निमग्न होकर अपनी विशाल सेना के साथ तेजी से कुण्डिन के लिए कूच कर गये। उनकी सेना में पैदल तथा हाथी, घोड़े और रथ पर सवार सैनिक थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥