श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 23

 
श्लोक
अहो त्रियामान्तरित उद्वाहो मेऽल्पराधस: ।
नागच्छत्यरविन्दाक्षो नाहं वेद्‍म्यत्र कारणम् ।
सोऽपि नावर्ततेऽद्यापि मत्सन्देशहरो द्विज: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—हाय; त्रि-याम—तीन पहर (नौ घंटे) अर्थात् पूरी रात; अन्तरित:—बीत चुकी; उद्वाह:—विवाह; मे—मेरा; अल्प— अपर्याप्त; राधस:—सौभाग्य; न आगच्छति—नहीं आता है; अरविन्द-अक्ष:—कमल-नेत्रों वाले कृष्ण; न—नहीं; अहम्—मैं; वेद्मि—जानती हूँ; अत्र—इस; कारणम्—कारण के लिए; स:—वह; अपि—भी; न आवर्तते—नहीं लौटा है; अद्य अपि—अब भी; मत्—मेरे; सन्देश—सन्देश का; हर:—ले जाने वाला; द्विज:—ब्राह्मण ।.
 
अनुवाद
 
 [राजकुमारी रुक्मिणी ने सोचा] : हाय! रात बीत जाने पर मेरा विवाह होना है! मैं कितनी अभागिनी हूँ! कमल-नेत्र कृष्ण अभी भी नहीं आये। मैं नहीं जानती क्यों? यहाँ तक कि ब्राह्मण-दूत भी अभी तक नहीं लौटा।
 
तात्पर्य
 जैसाकि श्लोक से प्रकट है और जैसाकि श्रील श्रीधर स्वामी द्वारा
पुष्टि हुई है वर्तमान घटना सूर्योदय के पूर्व घटती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥