श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 24

 
श्लोक
अपि मय्यनवद्यात्मा द‍ृष्ट्वा किञ्चिज्जुगुप्सितम् ।
मत्पाणिग्रहणे नूनं नायाति हि कृतोद्यम: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
अपि—शायद; मयि—मुझमें; अनवद्य—निर्दोष; आत्मा—मन तथा शरीर वाला; दृष्ट्वा—देखकर; किञ्चित्—कुछ कुछ; जुगुप्सितम्—घृणित; मत्—मेरा; पाणि—हाथ; ग्रहणे—ग्रहण करने के लिए; नूनम्—निस्सन्देह; न आयाति—नहीं आया है; हि—निश्चय ही; कृत-उद्यम:—पहले ऐसा चाहते हुए भी ।.
 
अनुवाद
 
 लगता है कि निर्दोष प्रभु ने यहाँ आने के लिए तैयार होते समय भी मुझमें कुछ घृणित बात देखी हो, जिससे वे मेरा पाणिग्रहण करने नहीं आये।
 
तात्पर्य
 राजकुमारी रुक्मिणी ने निर्भीक होकर कृष्ण को अपना अपहरण करने के लिए आमंत्रित किया था। जब रुक्मिणी ने देखा कि वे नहीं आये तो वह भयभीत हुई कि शायद उन्होंने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि हो सकता है कि उसमें कोई अग्राह्य दोष दिखा हो। जैसाकि यहाँ व्यक्त हुआ है, भगवान् अनवद्य अर्थात् निर्दोष हैं अत: यदि
उन्हें रुक्मिणी में कोई दोष दिखा हो तो वह उनके लिए अयोग्य दुलहन सिद्ध होगी। उस युवती राजकुमारी के लिए ऐसी चिन्ता करना स्वाभाविक था। यही नहीं, यदि श्रीकृष्ण ने सचमुच ऐसा निर्णय कर लिया है, तो ब्राह्मण के लिए स्वाभाविक होगा कि रुक्मिणी की प्रतिक्रिया के विषय में भयभीत हो यदि वह ऐसा समाचार उन तक लाता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥