श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 27

 
श्लोक
एवं वध्वा: प्रतीक्षन्त्या गोविन्दागमनं नृप ।
वाम ऊरुर्भुजो नेत्रमस्फुरन् प्रियभाषिण: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; वध्वा:—बधु, दुलहन; प्रतीक्षन्त्या:—प्रतीक्षारत; गोविन्द-आगमनम्—कृष्ण का आगमन; नृप—हे राजा (परीक्षित); वाम:—बाँईं; ऊरु:—जाँघ; भुज:—बाँह; नेत्रम्—तथा आँख; अस्फुरन्—फडक़ने लगीं; प्रिय—वांछित; भाषिण:—बताती हुईं ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, जब वह दुलहन गोविन्द के आगमन की इस तरह प्रतीक्षा कर रही थी तो उसे लगा कि उसकी बाईं जाँघ, बाईं भुजा तथा बाईं आँख फडक़ रही हैं। यह इसका संकेत था कि कुछ प्रिय घटना घटने वाली है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥