श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 3

 
श्लोक
तामानयिष्य उन्मथ्य राजन्यापसदान् मृधे ।
मत्परामनवद्याङ्गीमेधसोऽग्निशिखामिव ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उसको; आनयिष्ये—मैं यहाँ लाऊँगा; उन्मथ्य—मथ कर; राजन्य—राजवर्ग के; अपसदान्—अयोग्य सदस्यों को; मृधे—युद्ध में; मत्—मेरे प्रति; पराम्—पूर्णतया समर्पित; अनवद्य—निर्विवाद; अङ्गीम्—शारीरिक सौन्दर्य वाली को; एधस:— अग्नि जलाने वाला काष्ठ; अग्नि—अग्नि की; शिखाम्—लपटों; इव—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 वह अपने आपको एकमात्र मेरे प्रति समर्पित कर चुकी है और उसका सौन्दर्य निष्कलंक है। मैं उन अयोग्य राजाओं को युद्ध में उसी तरह मथ कर उसे यहाँ लाऊँगा जिस तरह काठ से प्रज्ज्वलित अग्नि उत्पन्न की जाती है।
 
तात्पर्य
 जब काष्ठ में से प्रसुप्त अग्नि प्रकट की जाती है, तो लपटें निकलती हैं और इस क्रिया में काष्ठ जल जाता है। इसी तरह भगवान् ने निर्भय होकर
भविष्यवाणी की कि, रुक्मिणी उनसे पाणिग्रहण करने के लिए आगे आयेगी और ऐसा होने पर दुष्ट राजागण कृष्ण की संकल्प-अग्नि में जल जायेंगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥