श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 37

 
श्लोक
अस्यैव भार्या भवितुं रुक्‍मिण्यर्हति
नापरा । असावप्यनवद्यात्मा भैष्म्या: समुचित: पति: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
अस्य—उसकी; एव—एकमात्र; भार्या—पत्नी; भवितुम्—होने के लिए; रुक्मिणी—रुक्मिणी; अर्हति—पात्र है; न अपरा— कोई दूसरी नहीं; असौ—वह; अपि—भी; अनवद्य—निर्दोष; आत्मा—स्वरूप; भैष्म्या:—भीष्मक की पुत्री के लिए; समुचित:—उपयुक्त; पति:—पति ।.
 
अनुवाद
 
 [नगरवासियों ने कहा] एकमात्र रुक्मिणी उनकी पत्नी बनने के योग्य हैं और वे भी दोषरहित सौन्दर्यवान होने से राजकुमारी भैष्मी के लिए एकमात्र उपयुक्त पति हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार इस श्लोक में विभिन्न नागरिकों के कथन सम्मिलित हैं। कुछ लोगों ने संकेत किया कि रुक्मिणी कृष्ण के लिए उपयुक्त पत्नी है, दूसरों ने कहा कि उनके
सिवाय अन्य कोई इसके योग्य नहीं है। इसी प्रकार कुछेक ने कहा कि कृष्ण रुक्मिणी के सर्वाधिक योग्य पति हैं और अन्यों ने कहा कि उनके अतिरिक्त अन्य कोई योग्य पति है ही नहीं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥