श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 38

 
श्लोक
किञ्चित्सुचरितं यन्नस्तेन
तुष्टस्‍त्रिलोककृत् ।
अनुगृह्णातु गृह्णातु वैदर्भ्या: पाणिमच्युत: ॥
३८ ॥
 
शब्दार्थ
किञ्चित्—तनिक भी; सु-चरितम्—पुण्य कर्म; यत्—जो भी; न:—हमारे; तेन—उसी से; तुष्ट:—संतुष्ट; त्रि-लोक—तीनों लोक का; कृत्—स्रष्टा, विधाता; अनुगृह्णातु—दया दिखलाये; गृह्णातु—जिससे ग्रहण करे; वैदर्भ्या:—रुक्मिणी का; पाणिम्— हाथ; अच्युत:—कृष्ण ।.
 
अनुवाद
 
 हम लोगों ने जो भी पुण्य कर्म किये हों उनसे तीनों लोकों के स्रष्टा अच्युत प्रसन्न हों और वे वैदर्भी का पाणिग्रहण करने की अनुकम्पा दिखलायें।
 
तात्पर्य
 विदर्भ के भक्त नागरिकों ने प्रेमवश अपने समस्त संचित पुण्य राजकुमारी रुक्मिणी को
अर्पित कर दिये। वे भगवान् कृष्ण के साथ उनका विवाह देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥