श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 45

 
श्लोक
तां वै प्रवयसो बालां विधिज्ञा विप्रयोषित: ।
भवानीं वन्दयांचक्रुर्भवपत्नीं भवान्विताम् ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उसको; वै—निस्सन्देह; प्रवयस:—बड़ी बूढ़ी; बालाम्—युवती को; विधि—विधि-विधान की; ज्ञा:—जानने वाली; विप्र—ब्राह्मणों की; योषित:—पत्नियाँ; भवानीम्—देवी भवानी को; वन्दयाम् चक्रु:—वन्दना करायी; भव-पत्नीम्—भव (शिवजी) की पत्नी की; भव-अन्विताम्—भव समेत ।.
 
अनुवाद
 
 ब्राह्मणों की बड़ी बूढ़ी पत्नियाँ जो विधि-विधान में पटु थीं, रुक्मिणी को भवानी को नमस्कार कराने ले गईं जो अपने प्रियतम भगवान् भव (शिवजी) के साथ प्रकट हुईं।
 
तात्पर्य
 आचार्यों के अनुसार यहाँ पर भवान्विताम् शब्द सूचित करता है कि रुक्मिणी जिस अम्बिका मन्दिर में गई थीं उसकी अधिष्ठात्री देवी थीं जिनके पति उनका साथ देने के लिए प्रकट हो गए। इस तरह स्त्रियों द्वारा यह अनुष्ठान विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती की टीका है कि विधिज्ञा: शब्द से यह जाना जा सकता है कि ब्राह्मणों की विद्वान पत्नियाँ रुक्मिणी की कृष्ण से विवाह करने की इच्छा से परिचित थीं अत: वन्दयां चक्रु: से यह सूचित होता है कि उन्होंने रुक्मिणी को उसके लिए प्रार्थना करने के लिए प्रेरित किया जो वह वास्तव में चाहती थीं ताकि भवानी की ही तरह रुक्मिणी अपने शाश्वत पुरुष संगी से मिल सकें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥