श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 46

 
श्लोक
नमस्ये त्वाम्बिकेऽभीक्ष्णं स्वसन्तानयुतां शिवाम् ।
भूयात् पतिर्मे भगवान् कृष्णस्तदनुमोदताम् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
नमस्ये—मैं नमस्कार करती हूँ; त्वा—तुम्हें; अम्बिके—हे अम्बिका; अभीक्ष्णम्—निरन्तर; स्व—आपके; सन्तान—बच्चों; युताम्—सहित; शिवाम्—शिव-पत्नी को; भूयात्—होयें; पति:—पति; मे—मेरे; भगवान्—भगवान्; कृष्ण:—कृष्ण; तत्— उसे; अनुमोदताम्—अनुमति दें ।.
 
अनुवाद
 
 [राजकुमारी रुक्मिणी ने प्रार्थना की] हे शिव-पत्नी माता अम्बिका! मैं बारम्बार आपको तथा आपकी सन्तान को नमस्कार करती हूँ। कृपया यह वर दें कि भगवान् कृष्ण मेरे पति होएँ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥