श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 51-55

 
श्लोक
तां देवमायामिव धीरमोहिनीं
सुमध्यमां कुण्डलमण्डिताननाम् ।
श्यामां नितम्बार्पितरत्नमेखलां
व्यञ्जत्स्तनीं कुन्तलशङ्कितेक्षणाम् ।
शुचिस्मितां बिम्बफलाधरद्युति-
शोणायमानद्विजकुन्दकुड्‍मलाम् ॥ ५१ ॥
पदा चलन्तीं कलहंसगामिनीं
सिञ्जत्कलानूपुरधामशोभिना ।
विलोक्य वीरा मुमुहु: समागता
यशस्विनस्तत्कृतहृच्छयार्दिता: ॥ ५२ ॥
यां वीक्ष्य ते नृपतयस्तदुदारहास-
व्रीदावलोकहृतचेतस उज्झितास्‍त्रा: ।
पेतु: क्षितौ गजरथाश्वगता विमूढा
यात्राच्छलेन हरयेऽर्पयतीं स्वशोभाम् ॥ ५३ ॥
सैवं शनैश्चलयती चलपद्मकोशौ
प्राप्तिं तदा भगवत: प्रसमीक्षमाणा ।
उत्सार्य वामकरजैरलकानपाङ्गै:
प्राप्तान् ह्रियैक्षत नृपान् दद‍ृशेऽच्युतं च ॥ ५४ ॥
तां राजकन्यां रथमारुरुक्षतीं
जहार कृष्णो द्विषतां समीक्षताम् ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उसको; देव—भगवान् की; मायाम्—माया; इव—सदृश; धीर—गम्भीर रहने वाले भी; मोहिनीम्—मोहने वाली; सु- मध्यमाम्—सुघड़ कमर वाली; कुण्डल—कान के कुण्डलों से; मण्डित—सुसज्जित; आननाम्—मुख वाली; श्यामाम्— निष्कलुष सौन्दर्य; नितम्ब—कूल्हे पर; अर्पित—स्थित; रत्न—रत्नजटित; मेखलाम्—करधनी; व्यञ्जत्—उभड़ रहे; स्तनीम्— स्तनों वाली; कुन्तल—केशराशि का; शङ्कित—डरी हुई; ईक्षणाम्—नेत्रों वाली; शुचि—शुद्ध; स्मिताम्—मन्दहास-युक्त; बिम्ब-फल—बिम्ब फल की तरह; अधर—होंठों वाली; द्युति—चमक से; शोणायमान—लाल लाल हो रही; द्विज—दाँत; कुन्द—चमेली की; कुड्मलाम्—कलियों जैसे; पदा—पाँवों से; चलन्तीम्—चलती हुई; कल-हंस—राजहंस की तरह; गामिनीम्—गमन करने वाली; सिञ्जत्—रुनझुन करती; कला—पटुता से सँवारे; नूपुर—पायलों के; धाम—तेज से; शोभिना—सुशोभित; विलोक्य—देखकर; वीरा:—वीरगण; मुमुहु:—मुग्ध हो गये; समागता:—एकत्र हुए; यशस्विन:— सम्मानित; तत्—उससे; कृत—उत्पन्न; हृत्-शय—कामवासना से; अर्दिता:—पीडि़त; याम्—जिसको; वीक्ष्य—देखकर; ते— वे; नृ-पतय:—राजागण; तत्—उसकी; उदार—विस्तृत; हास—हँसी से; व्रीडा—लज्जा का; अवलोक—तथा चितवन; हृत— चुराये गये; चेतस:—जिनके मन; उज्झित—डालकर; अस्त्रा:—अपने हथियार; पेतु:—गिर पड़े; क्षितौ—पृथ्वी पर; गज— हाथियों; रथ—रथों; अश्व—तथा घोड़ों पर; गता:—बैठे; विमूढा:—मूर्छित होकर; यात्रा—जुलूस के; छलेन—बहाने; हरये— हरि या कृष्ण के प्रति; अर्पयतीम्—अर्पित कर रही; स्व—अपना; शोभाम्—सौन्दर्य; सा—वह; एवम्—इस तरह; शनै:—धीरे धीरे; चलयती—चलती हुई; चल—हिल रहे; पद्म—कमल के फूल के; कोशौ—दो कोश (दो पाँव); प्राप्तिम्—आगमन; तदा—तब; भगवत:—भगवान् की; प्रसमीक्षमाणा—उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करती; उत्सार्य—धकेलते हुए; वाम—बाँयें; कर जै:—अपने हाथ के नाखुनों से; अलकान्—बालों को; अपाङ्गै:—तिरछी चितवन से; प्राप्तान्—वहाँ उपस्थित; ह्रिया—लज्जा से; ऐक्षत—उसने देखा; नृपान्—राजाओं को; ददृशे—देखा; अच्युतम्—कृष्ण को; च—तथा; ताम्—उस; राज-कन्याम्— राजकुमारी को; रथम्—उसका रथ; आरुरुक्षतीम्—चढऩे के लिए तैयार; जहार—पकड़ लिया; कृष्ण:—कृष्ण ने; द्विषताम्— अपने शत्रु के; समीक्षताम्—देखते देखते ।.
 
अनुवाद
 
 रुक्मिणी भगवान् की उस मायाशक्ति की तरह मोहने वाली प्रतीत हो रही थीं जो बड़े बड़े धीर-गम्भीर पुरुषों को भी मोह लेती है। इस तरह राजागण उनके सुकुमार सौन्दर्य, उनकी सुघड़ कमर तथा कुण्डलों से सुशोभित मुख को निहारने लगे। उनके कूल्हे पर रत्नजटित करधनी शोभा पा रही थी, उनके स्तन अभी उभड़ ही रहे थे और उनकी आँखें उनकी लटकती केशराशि से चंचल लग रही थीं। वे मधुर हँसी से युक्त थीं और उनके चमेली की कली जैसे दाँतों से उनके बिम्ब जैसे लाल होंठों की चमक प्रतिबिम्बित हो रही थी। जब वे राजहंस जैसी चाल से चलने लगीं तो उनके रुनझुन करते पायलों के तेज से उनके चरणों की शोभा बढ़ गई। उन्हें देखकर एकत्रित वीरजन पूर्णतया मोहित हो गये। कामवासना से उनके हृदय विदीर्ण हो गये। दरअसल जब राजाओं ने उनकी विस्तृत मुसकान तथा लजीली चितवन देखी तो वे सम्मोहित हो गये, उन्होंने अपने अपने हथियार डाल दिये और वे मूर्छित होकर अपने अपने हाथियों, रथों तथा घोड़ों पर से जमीन पर गिर पड़े। जुलूस के बहाने रुक्मिणी ने अकेले कृष्ण के लिए ही अपना सौन्दर्य प्रदर्शित किया। उन्होंने भगवान् के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए धीरे धीरे चलायमान कमलकोश रूपी दो चरणों को आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने बाँए हाथ के नाखुनों से अपने मुख पर लटकते केश-गुच्छों को हटाया और अपने समक्ष खड़े राजाओं की ओर कनखियों से देखा। उसी समय उन्हें कृष्ण दिख गये। तभी अपने दुश्मनों के देखते देखते भगवान् ने राजकुमारी को पकड़ लिया जो उनके रथ पर चढऩे के लिए आतुर थी।
 
तात्पर्य
 श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार रुक्मिणी अपने प्रियतम कृष्ण को देखने के लिए आतुर थीं इसलिए उन्हें चिन्ता थी कि उनके बालों के गुच्छे उनकी दृष्टि में बाधक न हों। अभक्त या असुरगण भगवान् के एश्वर्य को देखकर मोहित हो जाते हैं और सोचते हैं कि भगवान् की शक्ति उनकी स्थूल इन्द्रियों की तृप्ति के निमित्त है। लेकिन कृष्ण की अंतरंगा ह्लादिनी शक्ति की अंश रूपा रुक्मिणी तो एकमात्र कृष्ण की थीं।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने श्यामा प्रकार की स्त्री का वर्णन करने के लिए निम्नलिखित उद्धरण दिया है—

शीतकाले भवेद् उष्णो उष्णकाले तु शीतला।

स्तनौ सुकठिनौ यस्या: सा श्यामा परिकीर्तिता ॥

“वह स्त्री श्यामा कहलाती है, जिसके स्तन अत्यन्त कठोर होते हैं और उसके सामने आने वाला व्यक्ति जाड़े में अपने को गर्म तथा गर्मी में अपने को शीतल अनुभव करता है।” श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती यह भी इंगित करते हैं कि चूँकि रुक्मिणी का सुन्दर रूप भगवान् की अन्तरंगा शक्ति का प्राकट्य है, अत: अभक्तगण उसकी ओर नहीं देख सकते। इस तरह विदर्भ में एकत्र बलवान राजा भगवान् की माया शक्ति या रुक्मिणी के अंश को देखकर कामुक हो उठे थे। दूसरे शब्दों में, भगवान् की नित्य संगिनी को देखकर कोई काम-मोहित नहीं हो सकता क्योंकि काम से कलुषित होते ही मन को माया का आवरण आध्यात्मिक जगत तथा उसके निवासियों के आद्य सौन्दर्य से विलग कर देता है।

अन्त में, श्रीमती रुक्मिणी देवी अन्य राजाओं को तिरछी नजर से देखकर लजा सी गईं क्योंकि वे उन निकृष्टजनों की नजरों से अपनी नजरें नहीं मिलाना चाहती थीं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥