श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में बतलाया गया है कि भगवान् श्रीकृष्ण किस तरह विदर्भ की राजधानी कुण्डिन पहुँचे और बलशाली शत्रुओं की उपस्थिति में उन्होंने रुक्मिणी का अपहरण किया।
जब कृष्ण ब्राह्मण-दूत से रुक्मिणी का पत्र सुन चुके तो भगवान् ने उससे कहा, “असल में, मैं रुक्मिणी के प्रति आकृष्ट हूँ और जानता हूँ कि उसका भाई रुक्मी मेरे साथ उसके विवाह का विरोध करता है। इसलिए मुझे सारे निम्नवर्गीय राजाओं का दमन करके उसका अपहरण उसी तरह करना चाहिए जिस तरह लकड़ी में से घर्षण द्वारा अग्नि उत्पन्न की जाती है।” चूँकि रुक्मिणी तथा शिशुपाल का यह विवाह केवल तीन दिनों के भीतर सम्पन्न होने को था अत: भगवान् कृष्ण ने दारुक से कहा कि वह तुरन्त रथ को तैयार करे। तत्पश्चात् वे तुरन्त विदर्भ के लिए रवाना हो गये जहाँ वे रात-भर यात्रा करने के बाद पहुँच गये।

राजा भीष्मक अपने पुत्र रुक्मी के स्नेह में फँस कर अपनी पुत्री शिशुपाल को देने के लिए तैयार था। उसने सभी आवश्यक तैयारियाँ करवा लीं—उसने नगर को अनेक प्रकार से सजवाया और मुख्य सडक़ों तथा चौराहों की सफाई करवाई। चेदिराज दमघोष भी अपने पुत्र के विवाह के लिए सारी आवश्यक तैयारियाँ करके विदर्भ आ पहुँचा। राजा भीष्मक ने उसका समुचित सत्कार किया और ठहरने के लिए स्थान प्रदान किया। अन्य अनेक राजा—यथा जरासन्ध, शाल्व तथा दन्तवक्र—भी इस अवसर को देखने आये। कृष्ण के इन शत्रुओं ने षड्यंत्र रचा था कि यदि कृष्ण आयें तो दुलहन (वधू) का अपहरण कर लिया जाय। उन्होंने मिलकर कृष्ण से युद्ध करने की तैयारी कर ली और शिशुपाल को उसकी दुलहन दिलाने का पक्का इरादा कर लिया। ये योजनाएँ सुनकर बलदेवजी अपनी सारी सेना एकत्र करके तेजी से कुण्डिनपुर पहुँच गये।

विवाह के पूर्व की रात में रुक्मिणी विश्राम करने जा रही थीं किन्तु तब तक न तो ब्राह्मण आया था न ही कृष्ण। चिन्तामग्न वे अपने दुर्भाग्य को कोस रही थीं। तभी उनका बायाँ अंग फडक़ा और शुभ शकुन हुआ। दरअसल तुरन्त ही ब्राह्मण वहाँ आ पहुँचा और कृष्ण ने जो कुछ कहा था वह सारा हाल कह सुनाया—इसमें उनके अपहरण का पक्का वायदा भी था।

जब राजा भीष्मक ने सुना कि कृष्ण तथा बलराम आये हैं, तो वह बाजे-गाजे के साथ उनके सत्कार के लिए गया। उसने अनेक उपहारों के साथ उन दोनों की पूजा की और फिर उनके विश्राम के लिए स्थान निर्दिष्ट किया। इस तरह राजा ने इन दोनों की वैसी ही आवभगत की जैसी कि अन्य असंख्य राजसी अतिथियों के लिए की थी।

विदर्भ के लोग भगवान् कृष्ण को देखकर परस्पर बातें करने लगे कि वे ही रुक्मिणी के योग्य पति हैं। वे प्रार्थना करने लगे कि उनके जो भी पुण्यकर्म हों उनके बल पर कृष्ण का रुक्मिणी से पाणिग्रहण हो जाय।

जब श्रीमती रुक्मिणीदेवी का श्री अम्बिका के मन्दिर जाने का समय आ गया तो वह अनेक रक्षकों से घिर कर वहाँ गईं। वहाँ पर देवी को प्रणाम करके रुक्मिणी ने प्रार्थना की कि पति-रूप में उन्हें श्रीकृष्ण प्राप्त हों। तत्पश्चात् वे अपनी एक दासी का हाथ पकड़ कर अम्बिका मन्दिर से बाहर आईं। उनकी अकथनीय सुन्दरता देखकर वहाँ पर उपस्थित बड़े बड़े वीरों ने अपने हथियार डाल दिये और पृथ्वी पर अचेत होकर धराशायी हो गये। रुक्मिणी बड़ी होशियारी से तब तक चलती गईं जब तक उन्हें कृष्ण दिखाई नहीं पड़ गये। तब सबों के देखते देखते श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को अपने रथ में चढ़ा लिया। जिस तरह सियारों के झुंड में से सिंह अपना उचित भाग ले लेता है उसी तरह उन्होंने सारे विरोध करने वाले राजाओं को पीछे हटाकर अपना तथा अपने संगियों का रास्ता धीरे-धीरे बना लिया। जरासन्ध तथा अन्य राजा अपनी पराजय तथा अनादर को न सह सकने के कारण अपने को जोर-जोर से धिक्कारने लगे। इस अपयश को उन्होंने सिंह के भाग को एक क्षुद्र पशु द्वारा चुराये जाने के समान समझा।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥