श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 6: पूतना वध  »  श्लोक 4

 
श्लोक
सा खेचर्येकदोत्पत्य पूतना नन्दगोकुलम् ।
योषित्वा माययात्मानं प्राविशत् कामचारिणी ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
सा—वह (पूतना); खे-चरी—आकाश मार्ग में यात्रा करने वाली; एकदा—एक बार; उत्पत्य—उड़ते हुए; पूतना—पूतना; नन्द-गोकुलम्—नन्द महाराज के स्थान, गोकुल में; योषित्वा—सुन्दर स्त्री का वेश धारण करके; मायया—योगशक्ति से; आत्मानम्—अपने आपको; प्राविशत्—प्रवेश किया; काम-चारिणी—इच्छानुसार विचरण करने वाली ।.
 
अनुवाद
 
 एक बार स्वेच्छा से विचरण करने वाली पूतना राक्षसी बाह्य आकाश (अन्तरिक्ष) में घूम रही थी तो वह अपनी योगशक्ति से अपने को अति सुन्दर स्त्री के रूप में बदलकर नन्द महाराज के स्थान गोकुल में प्रविष्ट हुई।
 
तात्पर्य
 राक्षसी याँ ऐसी योगशक्ति जानती हैं जिनसे वे यंत्रों के बिना ही बाह्य आकाश में यात्रा कर सकती हैं। आज भी भारत के कुछ भागों में ऐसी डाइनें (जादूगरनियाँ) हैं, जो डंडे
पर बैठकर पलक मारते एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँच जाती हैं। पूतना को यह कला आती थी। उसने सुन्दर स्त्री का वेश धारण कर नन्द महाराज के धाम गोकुल में प्रवेश किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥