श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 6: पूतना वध  »  श्लोक 8

 
श्लोक
विबुध्य तां बालकमारिकाग्रहं
चराचरात्मा स निमीलितेक्षण: ।
अनन्तमारोपयदङ्कमन्तकं
यथोरगं सुप्तमबुद्धिरज्जुधी: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
विबुध्य—समझ कर; ताम्—उसको (पूतना को); बालक-मारिका-ग्रहम्—बालकों को मारने में पटु डाइन को; चर-अचर- आत्मा—सर्वव्यापक परमात्मा कृष्ण; स:—उसने; निमीलित-ईक्षण:—अपनी आँखें बन्द कर लीं; अनन्तम्—असीम; आरोपयत्—रख लिया; अङ्कम्—अपनी गोद में; अन्तकम्—अपने विनाश के लिए; यथा—जिस तरह; उरगम्—साँप को; सुप्तम्—सोये हुए; अबुद्धि—बुद्धिहीन व्यक्ति; रज्जु-धी:—साँप को रस्सी समझने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 बिस्तर पर लेटे सर्वव्यापी परमात्मा कृष्ण ने समझ लिया कि छोटे बालकों को मारने में पटु यह डाइन पूतना मुझे मारने आई है। अतएव उन्होंने अपनी आँखें बन्द कर लीं मानो उससे डर गये हों। तब पूतना ने अपने विनाश-रूप कृष्ण को अपनी गोद में ले लिया जिस तरह कि बुद्धिहीन मनुष्य सोते साँप को रस्सी समझ कर अपनी गोद में ले लेता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में दो जटिलताएँ हैं। जब कृष्ण ने देखा कि पूतना मुझे मारने आई है, तो उन्होंने सोचा कि क्योंकि यह स्त्री मातृ-स्नेह दिखाने आई है भले ही वह कृत्रिम ही क्यों न हो अत: उसे वर देना चाहिए। फलत: उन्होंने कुछ चिन्ता से उसे देखा और फिर अपनी आँखें बन्द कर लीं। पूतना राक्षसी भी सकपकाई थी। वह इतनी बुद्धिमान
न थी जो समझ पाती कि वह सोते सर्प को अपनी गोद में ले रही है; उसने सर्प को सामान्य रस्सी समझा। अन्तकम् तथा अनन्तम्—ये दोनों शब्द परस्पर विरोधी हैं। बुद्धिमान न होने के कारण पूतना ने सोचा कि वह अपने अन्तकम् अर्थात् काल को मार सकती है किन्तु अनन्त होने से उस बालक को कोई नहीं मार सकता था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥