श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने इस श्लोक की टीका इस प्रकार की है : “यहाँ भगवान् की मनोवृत्ति को इस प्रकार समझा जा सकता है : ‘जब मैंने रुक्मिणी को स्वर्गिक पारिजात वृक्ष का एक फूल लाकर दिया था, तो सत्यभामा ने इतना क्रोध प्रकट किया कि मैं उसके चरणों पर अपना सिर झुकाकर भी उसे शान्त नहीं कर पाया था। जब मैंने उसे पूरा पारिजात वृक्ष लाकर दिया तब जाकर वह प्रसन्न हुई थी। किन्तु रुक्मिणी ने जब मुझे सत्यभामा को पूरा वृक्ष देते हुए देखा तो भी कोई क्रोध प्रदर्शित नहीं किया। तो भला मैं किस तरह इस पत्नी के क्रुद्ध वचनों का अमृतपान कर सकता हूँ जो ईर्ष्यारहित है, जो अत्यन्त गम्भीर है और जो सदैव मधुर वचन बोलती है?” इस प्रकार विचार करते हुए भगवान् ने निश्चय किया, ‘यदि मैं उससे इस तरह बोलूँ तो इसका क्रोध उभार सकूँगा।’ कुछ विद्वान कृष्ण के रुक्मिणी के प्रति ऐसे बोलने की व्याख्या इस तरह से करते हैं।” आचार्य के अनुसार बलवद्भि: कृतद्वेषान् प्राय: शब्दों से यह सूचित होता है कि कृष्ण ने अपने अवतार के समय प्राय: समस्त समकालीन राजाओं का विरोध किया और केवल कुछ को—यथा पाण्डवों तथा अपने कुल के स्वामिभक्त सदस्यों को—ही अपना मित्र बनाया। निस्सन्देह, जैसाकि दशम स्कंध के प्रारम्भ में कहा गया है, भगवान् कृष्ण विशेष रूप से इसीलिए प्रकट हुए क्योंकि पृथ्वी असंख्य घटिया राजाओं से बोझिल हो चुकी थी और वे इस बोझ को दूर करना चाहते थे।
अन्त में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इंगित करते हैं कि त्यक्तनृपासनान् शब्द इस बात को सूचित करता है कि कंस का वध कर देने के बाद कृष्ण ने राजसिंहासन नम्रता से अपने नाना उग्रसेन को दे दिया था यद्यपि वे स्वयं इसके अधिकारी थे।