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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  10.60.33 
बभाष ऋषभं पुंसां वीक्षन्ती भगवन्मुखम् ।
सव्रीडहासरुचिरस्‍निग्धापाङ्गेन भारत ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
बभाष—बोली; ऋषभम्—अत्यन्त प्रसिद्ध; पुंसाम्—पुरुष से; वीक्षन्ती—देखती हुई; भगवत्—भगवान् के; मुखम्—मुख को; स-व्रीड—सलज्ज; हास—हँसी से युक्त; रुचिर—आकर्षक; स्निग्ध—स्नेहिल; अपाङ्गेन—तथा चितवन से; भारत—हे भरतवंशी ।.
 
अनुवाद
 
 हे भरतवंशी, भगवान् के मुख पर अपनी आकर्षक तथा स्नेहिल चितवन डालते हुए रुक्मिणी लज्जा से हँसते हुए नर-श्रेष्ठ भगवान् से इस प्रकार बोलीं।
 
 
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