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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 60: रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  10.60.37 
निष्किञ्चनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किञ्चिद्
यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्या: ।
न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तकमाढ्यतान्धा:
प्रेष्ठो भवान् बलिभुजामपि तेऽपि तुभ्यम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
निष्किञ्चन:—सम्पत्तिविहीन; ननु—निस्सन्देह; भवान्—आप; —नहीं; यत:—जिसके परे; अस्ति—है; किञ्चित्—कुछ भी; यस्मै—जिसको; बलिम्—भेंट; बलि—भेंट का; भुज:—भोक्ता; अपि—भी; हरन्ति—वहन करते हैं; अज-आद्या:—ब्रह्मा इत्यादि; —नहीं; त्वा—तुमको; विदन्ति—जानते हैं; असु-तृप:—शरीर से तुष्ट रहने वाले व्यक्ति; अन्तकम्—मृत्यु के रूप में; आढ्यता—सम्पत्ति के अपने पद द्वारा; अन्धा:—अन्धे हुए; प्रेष्ठ:—परम प्रिय; भवान्—आप; बलि-भुजाम्—उपहार के परम भोक्ता के लिए; अपि—भी; ते—वे; अपि—भी; तुभ्यम्—तुमको (प्रिय हैं) ।.
 
अनुवाद
 
 आपके पास कुछ भी नहीं है क्योंकि आपसे परे कुछ भी नहीं है। बलि के परम भोक्ता, ब्रह्मा तथा अन्य देवता तक आपको नमस्कार करते हैं। जो लोग अपनी सम्पत्ति से अन्धे हुए रहते हैं और अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में लीन रहते हैं, वे काल रूप आपको नहीं पहचान पाते। बलि के भोक्ता देवताओं को आप उसी तरह परम प्रिय हैं जिस तरह कि वे आपको हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ श्रीमती रुक्मिणीदेवी श्लोक १४ में भगवान् कृष्ण के कथन का उत्तर देती हैं। कथन है—

निष्किञ्चना वयं शश्वन् निष्किञ्चनजनप्रिया:।

तस्मात् प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्यमे ॥

“हमारे पास कोई भौतिक सम्पत्ति नहीं है और हम उन्हीं को प्रिय हैं जिनके पास हमारी ही तरह कुछ नहीं है। अत: हे नाजुक कटि वाली! धनी लोग शायद ही मेरी पूजा करते हों।” महारानी रुक्मिणी निष्किञ्चनो ननु से अपनी बात शुरू करती हैं। किञ्चन् शब्द का अर्थ है “कुछ” और निर् या निष् उपसर्ग निषेधवाची है। अत: निष्किञ्चन् का सामान्य अर्थ “वह जिसके पास कुछ भी नहीं होता” या दूसरे शब्दों में “निर्धन” है।

किन्तु प्रस्तुत श्लोक में रुक्मिणी कहती हैं कि भगवान् कृष्ण के पास “कुछ भी नहीं” है इसलिए नहीं कि वे कंगाल है, प्रत्युत इसलिए कि वे ही सर्वस्व हैं। दूसरे शब्दों में, चूँकि कृष्ण परम सत्य हैं अतएव जो कुछ विद्यमान है, वह उनके भीतर है। उन्हें अन्य किसी बाह्य वस्तु को प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। उदाहरणार्थ, मनुष्य के पास घर, कार, पुत्र या धन हो सकता है किन्तु ये वस्तुएँ मनुष्य नहीं हो सकतीं क्योंकि ये उससे बाहर विद्यमान हैं। हम कहते हैं कि ये वस्तुएँ उसकी हैं केवल इसलिए कि इन पर उसका नियंत्रण रहता है। किन्तु भगवान् अपनी सृष्टि का केवल नियंत्रण ही नहीं करते हैं अपितु उनकी सृष्टि का अस्तित्व वस्तुत: उनके भीतर रहता है। इस तरह उनकी कोई भी वस्तु उस अर्थ में उनसे बाहर नहीं है, जिस तरह हमारे पास बाह्य वस्तुएँ होती हैं।

आचार्यों ने निष्किञ्चन् की व्याख्या इस प्रकार की है—इस कथन से कि किसी व्यक्ति के पास कोई वस्तु है यह अर्थ निकलता है कि उसके पास सारी वस्तुएँ नहीं हैं। दूसरे शब्दों में, यदि हम कहें कि मनुष्य के पास कुछ सम्पत्ति है, तो हमारा आशय यही रहता है कि सारी सम्पत्ति उसकी नहीं है अपितु उसका एक विशेष भाग उसका है। अमरीका के एक मानक शब्दकोष के अनुसार ‘कुछ’ का अर्थ होता है : कोई अनिश्चित अथवा अविशेष संख्या, राशि इत्यादि जो शेष से भिन्न है। संस्कृत के किञ्चन शब्द से कुल के एक अंश का बोध होता है। इस तरह इस विचार का निराकरण करने के लिए ही कृष्ण को निष्किञ्चन कहा गया है कि उनके पास सौन्दर्य, यश, सम्पत्ति, बुद्धि इत्यादि का केवल कुछ अंश ही है। प्रत्युत उनके पास अनन्त सौन्दर्य, सम्पत्ति, बुद्धि इत्यादि है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे परम सत्य हैं।

श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध, भाग एक की भूमिका का शुभारम्भ जो हमारी वर्तमान चर्चा से पूरी तरह संबद्ध है, श्रील प्रभुपाद इस तरह करते हैं, “ईश्वर की धारणा तथा परब्रह्म की धारणा दोनों समान स्तर पर नहीं हैं। श्रीमद्भागवत में परब्रह्म को लक्ष्य बनाया गया है। ईश्वर की धारणा नियन्ता की सूचक है, जबकि परब्रह्म की धारणा समस्त शक्तियों के चरम उद्गम की सूचक है।” यहाँ पर श्रील प्रभुपाद ने मूल दार्शनिक बात उठाई है। ईश्वर की सम्मान्य परिभाषा “परम व्यक्ति” है और शब्दकोश में परम के चार अर्थ हैं (१) सर्वोच्च पद, सत्ता इत्यादि (२) गुण, उपलब्धि, कुशलता में सर्वोच्च (३) सर्वोच्च कोटि (४) अन्तिम, चरम। इनमें से कोई भी परिभाषा परम सत्ता को पूरी तरह बोध नहीं कराती।

उदाहरणार्थ, हम कह सकते हैं कि एक विशेष अमरीकी व्यक्ति सर्वाधिक धनी है या यह कि उच्च न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायालय है किन्तु हमारे कथनों से यही अर्थ निकलता है कि वह अमरीकी व्यक्ति अन्य किसी से भी अधिक धनी है या वह न्यायालय देश के न्यायालयों से सबसे उच्च है यद्यपि इसे सभी राजनीतिक एवं सामाजिक मामलों में निश्चय ही पूर्ण अधिकार नहीं होते क्योंकि इन क्षेत्रों में इसकी सत्ता विधान सभा और राष्ट्रपति से बँटी होती है। इस तरह परम समस्त जीवों में सर्वोत्कृष्ट तथा सर्वोच्च का सूचक है किन्तु यहाँ विद्यमान हर वस्तु के उद्गम का नहीं है। इस तरह श्रील प्रभुपाद विशेष रूप से इंगित करते हैं कि परम सत्य कृष्ण की धारणा परम व्यक्ति की धारणा से उच्च है और वैष्णव दर्शन समझने के लिए यह परम सत्य होनी चाहिए।

भगवान् कृष्ण मात्र सर्वोपरि व्यक्ति ही नहीं, अपितु वे परम पुरुष हैं और उनकी पत्नी यही कहना चाह रही हैं। इस तरह से निष्किञ्चन शब्द यह नहीं सूचित करता कि कृष्ण के पास कोई ऐश्वर्य नहीं है अपितु यह कि उनके पास सम्पूर्ण ऐश्वर्य है। इस अर्थ में वे कृष्ण की निष्किञ्चन की परिभाषा स्वीकार करती हैं।

श्लोक १४ में कृष्ण ने यह भी कहा था निष्किञ्चन-जन-प्रिय:—मैं दरिद्रों का प्रिय हूँ। किन्तु यहाँ पर रुक्मिणी संकेत करती हैं कि ब्रह्माण्ड के सबसे धनी जीव देवतागण भगवान् को नियमित बलि देते रहते हैं। हम यह मान सकते हैं कि भगवान् द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि होने के नाते सारे देवता यह जानते हैं कि हर वस्तु उन्हीं की है क्योंकि हर वस्तु उनका अंश है जैसाकि ऊपर कहा गया है। अत: निष्किञ्चन-जन-प्रिय: इस विचार से सही है कि भगवान् तथा उनकी शक्तियों के अलावा कुछ भी नहीं है, भले ही भगवान् की पूजा करने वाले व्यक्ति कितने ही धनी क्यों न प्रतीत हों, वे ईश्वर को प्रेममय कार्य के रूप में वस्तुत: उन्हीं की शक्ति अर्पित कर रहे होते हैं। यही विचार गंगाजल द्वारा गंगा की पूजा करने में या कि पिता के जन्मदिवस पर पिता से प्राप्त धन से उसके पुत्र द्वारा खरीद कर भेंट की जाने वाली वस्तु से प्रकट होता है। यद्यपि पिता ही अपनी भेंट के लिए धन देता है किन्तु वह जिस वस्तु में रुचि रखता है, वह है अपने पुत्र का प्रेम। इसी तरह भगवान् इस विराट जगत को उत्पन्न करते हैं और तब बद्ध-आत्माएँ भगवान् की सृष्टि में से विविध वस्तुएँ संग्रह कर लेती हैं। पवित्रात्माएँ अपने संग्रह में से कुछ सर्वोत्कृष्ट वस्तुएँ बलि के रूप में भगवान् को अर्पित करती हैं और इस तरह अपने को पवित्र बनाती हैं। चूँकि सारा ब्रह्माण्ड तथा सारी वस्तुएँ भगवान् की शक्ति मात्र हैं अतएव हम यह कह सकते हैं कि जो लोग भगवान् की पूजा करते हैं उनके पास कुछ भी नहीं होता।

अधिक रूढिग़त रुप से तो यह कह सकते हैं कि जिन्हें अपनी विशाल सम्पत्ति का गर्व है वे ईश्वर के समक्ष नतमस्तक नहीं होते। रानी रुक्मिणी भी इन मूर्खों का उल्लेख करती हैं। वे अपने नश्वर शरीरों से सन्तुष्ट रहकर मृत्यु की दैवी शक्ति को जो उनका चुपके से शिकार करती है, नहीं समझ पाते। किन्तु देवतागण जो सर्वाधिक धनी जीव हैं भगवान् को नियमित बलि चढ़ाते हैं और इस तरह जैसा यहाँ वर्णित है भगवान् उन्हें सर्वाधिक प्रिय हैं।

 
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