श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 62: ऊषा-अनिरुद्ध मिलन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
अनपायिभिरस्माभिर्गुप्तायाश्च गृहे प्रभो ।
कन्याया दूषणं पुम्भिर्दुष्प्रेक्ष्याया न विद्महे ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
अनपायिभि:—जो कभी बाहर नहीं गये; अस्माभि:—हमारे द्वारा; गुप्ताया:—जिसकी रखवाली की जा रही हो, उसका; च— तथा; गृहे—महल के भीतर; प्रभो—हे स्वामी; कन्याया:—कुमारी का; दूषणम्—दूषित होना; पुम्भि:—मनुष्यों द्वारा; दुष्प्रेक्ष्याया:—जिसको देख पाना असम्भव हो; न विद्महे—हमारी समझ में नहीं आता ।.
 
अनुवाद
 
 “हे स्वामी, हम अपने स्थानों से कहीं नहीं हटीं और सतर्कतापूर्वक उसकी निगरानी करती रही हैं अत: यह हमारी समझ में नहीं आता कि यह कुमारी जिसे कोई पुरुष देख भी नहीं पा सकता महल के भीतर कैसे दूषित हो गई है।”
 
तात्पर्य
 आचार्यों का कहना है कि अनपायिभि: का अर्थ “कभी बाहर न जाते हुए” अथवा “कभी ठगे नहीं गये” हो सकता है। यदि हम दुष्प्रेक्ष्याया के स्थान पर दुष्प्रेष्याया: पाठ मानें तो रक्षकगण उषा के विषय में कहते हैं, “वह जिसकी दुष्ट सखी दूत बनाकर भेजी गई है।”
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥