श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 2

 
श्लोक
नारदात्तदुपाकर्ण्य वार्तां बद्धस्य कर्म च ।
प्रययु: शोणितपुरं वृष्णय: कृष्णदैवता: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
नारदात्—नारद से; तत्—उस; उपाकर्ण्य—सुनकर; वार्ताम्—समाचार को; बद्धस्य—पकड़े हुए के विषय में; कर्म—कर्म; च—तथा; प्रययु:—वे गये; शोणित-पुरम्—शोणितपुर; वृष्णय:—वृष्णिजन; कृष्ण—भगवान् कृष्ण; दैवता:—उनके पूज्य देव के रूप में प्राप्त ।.
 
अनुवाद
 
 नारद से अनिरुद्ध के कार्यों तथा उसके बन्दी होने के समाचार सुनकर, भगवान् कृष्ण को अपना पूज्य देव मानने वाले वृष्णिजन शोणितपुर गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥