श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 26

 
श्लोक
कालो दैवं कर्म जीव: स्वभावो
द्रव्यं क्षेत्रं प्राण आत्मा विकार: ।
तत्सङ्घातो बीजरोहप्रवाह-
स्त्वन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
काल:—समय; दैवम्—भाग्य; कर्म—भौतिक कर्म के फल; जीव:—व्यष्टि जीव; स्वभाव:—उसकी इच्छाएँ; द्रव्यम्—पदार्थ का सूक्ष्म रूप; क्षेत्रम्—शरीर; प्राण:—प्राण-वायु; आत्मा—मिथ्या अहंकार; विकार:—(ग्यारह इन्द्रियों के) रूपान्तर; तत्— इन सबों का; सङ्घाट:—संमेल (सूक्ष्म शरीर के रूप में); बीज—बीज; रोह—तथा अंकुर का; प्रवाह:—निरन्तर बहाव; त्वत्— तुम्हारा; माया—भौतिक मोहिनी शक्ति; एषा—यह; तत्—इसके; निषेधम्—निषेध (आप); प्रपद्ये—शरण के लिए आया हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 काल, भाग्य, कर्म, जीव तथा उसका स्वभाव, सूक्ष्म भौतिक तत्त्व, भौतिक शरीर, प्राण वायु, मिथ्या अहंकार, विभिन्न इन्द्रियाँ तथा जीव के सूक्ष्म शरीर में प्रतिबिम्बित इन सबों की समग्रता—ये सभी आपकी माया हैं, जो बीज तथा पौधे के अन्तहीन चक्र जैसे हैं। इस माया का निषेध, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।
 
तात्पर्य
 बीजरोह प्रवाह शब्द की व्याख्या इस तरह की जाती है : बद्धजीव भौतिक शरीर ग्रहण करता है, जिससे वह भौतिक जगत का भोग करने का प्रयास करता है। यह शरीर भावी जगत का बीज है क्योंकि जब कोई व्यक्ति इस शरीर से कर्म करता है, तो उससे अन्य कर्म उत्पन्न होते हैं, जो बढक़र (रोह ) दूसरा भौतिक शरीर धारण करने के लिए बाध्य कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, भौतिक जीवन कर्म तथा फल की शृंखला है। भगवान् की शरण में जाने का निर्णय बद्धजीव को इस व्यर्थ के बारम्बार वृद्धि तथा फल से छुटकारा दिला देता है।
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार तन्निषेधं प्रपद्ये शब्द बतलाते हैं कि भगवान् कृष्ण निषेधावधिभूतम्—निषेध की अवधि—हैं। दूसरे शब्दों में, जब सारे मोह का निषेध हो जाता है, तो परम सत्य बचा रहता है।

शिक्षा की विधि ज्ञानार्जन द्वारा अज्ञान के उन्मूलन की विधि कही जा सकती है। आगमन, निगमन तथा प्रज्ञा विधियों से हम बाहर से सुन्दर, मोहमय तथा अपूर्ण का निराकरण करने का प्रयास करते हैं और अपने को पूर्णज्ञान के पद तक उठाना चाहते हैं। अन्ततोगत्वा जब मोह का निषेध हो जाता है तब जो ठोस रूप में बच जाता है, वह परम सत्य भगवान् है।

पिछले श्लोक में शिवज्वर ने भगवान् को सर्वात्मानं केवलं ज्ञप्तिमात्रम् कहा है। अब शिवज्वर भगवान् के विषय में अपना दार्शनिक वर्णन यह कह कर समाप्त करता है कि संसार के विविध पक्ष भी परमेश्वर की शक्तियाँ हैं।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती उल्लेख करते हैं कि भगवान् का अपना शरीर तथा इन्द्रियाँ, जैसाकि तन्निषेधम् शब्द से पता चलता है, भगवान् के शुद्ध आध्यात्मिक शरीर से अभिन्न हैं। भगवान् के शरीर तथा इन्द्रियाँ न तो उनसे बाहर हैं न ही उन्हें आच्छादित करती हैं अपितु भगवान् अपने आध्यात्मिक रूप तथा इन्द्रियों से अभिन्न हैं। पूर्ण ब्रह्म अपनी असीम सम्मोहक विविधता से युक्त श्रीकृष्ण ही हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥