श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 27

 
श्लोक
नानाभावैर्लीलयैवोपपन्नै-
र्देवान् साधून् लोकसेतून् बिभर्षि ।
हंस्युन्मार्गान् हिंसया वर्तमानान्
जन्मैतत्ते भारहाराय भूमे: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
नाना—विविध; भावै:—मनोभावों से; लीलया—लीलाओं के रूप में; एव—निस्सन्देह; उपपन्नै:—कल्पित; देवान्—देवताओं; साधून्—साधुओं; लोक—संसार के; सेतून्—धर्मसंहिता को; बिभर्षि—स्थिर रखते हो; हंसि—संहार करते हो; उत्-मार्गान्— मार्ग से विपथ; हिंसया—हिंसा द्वारा; वर्तमानान्—जीवित; जन्म—जन्म; एतत्—यह; ते—तुम्हारा; भार—भार; हाराय— उतारने के लिए; भूमे:—पृथ्वी का ।.
 
अनुवाद
 
 आप देवताओं, साधुओं तथा इस जगत के लिए धर्मसंहिता को बनाये रखने के लिए अनेक भावों से लीलाएँ करते हैं। इन लीलाओं से आप उनका भी वध करते हैं, जो सही मार्ग से हट जाते हैं और हिंसा द्वारा जीवन-यापन करते हैं। निस्सन्देह आपका वर्तमान अवतार पृथ्वी का भार उतारने के लिए है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (९.२९) में भगवान् कृष्ण कहते हैं : समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥

“न तो मैं किसी से द्वेष करता हूँ न मैं किसी का पक्षपात करता हूँ। मैं सबों के प्रति समभाव रखता हूँ। किन्तु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है—मुझमें है—और मैं भी उसका मित्र हूँ।”

देवता तथा साधु पुरुष (देवान् साधून् ) भगवान् की इच्छा पूरी करने के लिए समर्पित रहते हैं। देवता प्रशासक की तरह कार्य करते हैं और साधुजन अपने उपदेशों तथा आदर्शों से आत्म-साक्षात्कार तथा पवित्रता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। किन्तु जो लोग प्राकृतिक अर्थात् ईश्वर के नियमों का उल्लंघन करते हैं और अन्यों के साथ हिंसा करके जीते हैं, वे भगवान् द्वारा विविध लीला-अवतारों में विनष्ट कर दिये जाते हैं। जैसाकि भगवान् भगवद्गीता (४.११) में कहते हैं—ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्य-हम्। वे निष्पक्ष हैं किन्तु जीवों के कर्मों के प्रति समुचित प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥