श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 28

 
श्लोक
तप्तोऽहं ते तेजसा दु:सहेन
शान्तोग्रेणात्युल्बणेन ज्वरेण ।
तावत्तापो देहिनां तेऽङ्‍‍घ्रिमूलं
नो सेवेरन् यावदाशानुबद्धा: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
तप्त:—जलाया हुआ; अहम्—मैं; ते—तुम्हारी; तेजसा—शक्ति द्वारा; दु:सहेन—दुस्सह; शान्त—ठण्डा, शीतल; उग्रेण—फिर भी तप्त; अति—अत्यधिक; उल्बणेन—भयानक; ज्वरेण—ज्वर से; तावत्—तब तक; ताप:—जलन; देहिनाम्—देहधारियों की; ते—तुम्हारे; अङ्घ्रि—चरणों के; मूलम्—तलवा; न—नहीं; उ—निस्सन्देह; सेवेरन्—सेवा करते हैं; यावत्—जब तक; आशा—भौतिक इच्छाओं से; अनुबद्धा:—सतत बँधे हुए ।.
 
अनुवाद
 
 मैं आपके भयानक ज्वर अस्त्र के भयानक तेज से त्रस्त हूँ जो शीतल होकर भी ज्वल्यमान है। सारे देहधारी जीव तब तक कष्ट भोगते हैं जब तक वे भौतिक महत्वाकांक्षाओं से बँधे रहते हैं और आपके चरणकमलों की सेवा करने से दूर भागते हैं।
 
तात्पर्य
 पिछले श्लोक में शिवज्वर ने कहा था कि जो लोग हिंसा का जीवन बिताते हैं उन्हें भगवान् के हाथों वैसी ही हिंसा मिलती है। किन्तु यहाँ पर वह उसके आगे यह कहता है कि जो लोग भगवान् की शरण ग्रहण नहीं करते वे विशेष रूप से दण्डनीय
हैं। यद्यपि शिवज्वर ने अभी तक स्वयं हिंसात्मक कार्य किया था किन्तु भगवान् की शरण में आ जाने तथा अपना सुधार कर लेने के कारण आशावान है कि उसे भगवत्कृपा प्राप्त हो सकेगी। दूसरे शब्दों में, वह अब भगवद्भक्त बन गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥