श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 30

 
श्लोक
इत्युक्तोऽच्युतमानम्य गतो माहेश्वरो ज्वर: ।
बाणस्तु रथमारूढ: प्रागाद्योत्स्यन् जनार्दनम् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; उक्त:—कहे जाने पर; अच्युतम्—अच्युत भगवान् कृष्ण द्वारा; आनम्य—झुक कर; गत:—चला गया; माहेश्वर:—शिव का; ज्वर:—ज्वर अस्त्र; बाण:—बाण; तु—लेकिन; रथम्—अपने रथ पर; आरूढ:—चढ़ कर; प्रागात्— आगे आया; योत्स्यन्—युद्ध करने के उद्देश्य से; जनार्दनम्—भगवान् कृष्ण से ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा कहे जाने पर माहेश्वर-ज्वर ने अच्युत भगवान् को प्रणाम किया और चला गया। किन्तु तभी बाणासुर अपने रथ पर सवार होकर भगवान् कृष्ण से लडऩे के लिए प्रकट हुआ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥