श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 34

 
श्लोक
श्रीरुद्र उवाच
त्वं हि ब्रह्म परं ज्योतिर्गूढं ब्रह्मणि वाङ्‍मये ।
यं पश्यन्त्यमलात्मान आकाशमिव केवलम् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-रुद्र: उवाच—शिव ने कहा; त्वम्—तुम; हि—अकेले; ब्रह्म—परम सत्य; परम्—परम; ज्योति:—प्रकाश; गूढम्—छिपा हुआ; ब्रह्मणि—ब्रह्म में; वाक्-मये—भाषा के रूप में (वेदों में); यम्—जिसको; पश्यन्ति—देखते हैं; अमल—निष्कलंक; आत्मान:—जिनके हृदय; आकाशम्—आकाश के; इव—सदृश; केवलम्—शुद्ध ।.
 
अनुवाद
 
 श्री रुद्र ने कहा : आप ही एकमात्र परम सत्य, परम ज्योति तथा ब्रह्म की शाब्दिक अभिव्यक्ति के भीतर के गुह्य रहस्य हैं। जिनके हृदय निर्मल हैं, वे आपका दर्शन कर सकते हैं क्योंकि आप आकाश की भाँति निर्मल हैं।
 
तात्पर्य
 परम सत्य समस्त प्रकाश का उद्गम है अतएव वह परम प्रकाश है—आत्म-प्रकाशमय है। इस परम ब्रह्म की गुह्य विवेचना वेदों में की गई है इसलिए सामान्य पाठक की समझ के परे है। श्रील जीव गोस्वामी द्वारा गोपाल तापनी उपनिषद से उद्धृत निम्नलिखित कथन यह प्रदर्शित करते हैं कि वैदिक ध्वनियों से कभी कभी ब्रह्म का उद्घाटन किस तरह होता है—ते होचुरुपासनमेतस्य परात्मनो गोविन्दस्याखिलाधारिणो ब्रूहि (पूर्व खण्ड १७)—उन्होंने (चार कुमारों ने) (ब्रह्मा से) कहा—कृपया बतलायें कि गोविन्द की किस तरह पूजा करनी चाहिए जो परमात्मा हैं और जो प्रत्येक विद्यमान पदार्थ की आधारशिला हैं। चेतश्चेतनानाम् (पूर्व खण्ड २१)—वह समस्त जीवों में प्रमुख है। तथा तं ह देवम् आत्मवृत्तिप्रकाशम् (पूर्व खण्ड २३)—अपने आप की अनुभूति होने पर परमेश्वर की अनुभूति की जाती है। महान् आचार्य जीव गोस्वामी भी श्रीमद्भागवत से एक श्लोक (१.१०.४८) उद्धृत करते हैं—गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्—परब्रह्म मनुष्य सदृश रूप में छिपा है।
चूँकि भगवान् शुद्ध हैं, तो फिर कुछ लोग कृष्ण के रूप तथा कार्यों को अशुद्ध रूप में क्यों अनुभव करते हैं? आचार्य जीव गोस्वामी बतलाते हैं कि जिनके स्वयं के हृदय अशुद्ध हैं, वे शुद्ध भगवान् को नहीं समझ सकते। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती अर्जुन के प्रति भगवान् के ही उपदेश को श्री हरिवंश से उद्धृत करते हैं—

तत्परं परमं ब्रह्म सर्वं विभजते जगत्।

ममैव तद्धनं तेजो ज्ञातुमर्हसि भारत ॥

“उस (समग्र प्रकृति) से श्रेष्ठ परब्रह्म है, जिससे इस सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार होता है। हे भारत! तुम्हें जान लेना चाहिए कि परब्रह्म मेरे केन्द्रीभूत तेज से युक्त है।”

इस प्रकार शिवजी अपने भक्त को बचाने के लिए अपने नित्य आराध्य प्रभु भगवान् कृष्ण की स्तुति करते हैं। भगवान् की मोहिनी शक्ति ने शिवजी को कृष्ण से भिडऩे के लिए प्रेरित किया था किन्तु अब यह युद्ध समाप्त हो चुका था और अपने भक्त को बचाने के लिए शिवजी ये सुन्दर स्तुतियाँ करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥