श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 37

 
श्लोक
तवावतारोऽयमकुण्ठधामन्
धर्मस्य गुप्‍त्‍यै जगतो हिताय ।
वयं च सर्वे भवतानुभाविता
विभावयामो भुवनानि सप्त ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
तव—तुम्हारा; अवतार:—अवतार; अयम्—यह; अकुण्ठ—असीम; धामन्—हे शक्ति वाले; धर्मस्य—न्याय की; गुप्त्यै—रक्षा के लिए; जगत:—ब्रह्माण्ड के; हिताय—लाभ के लिए; वयम्—हम; च—भी; सर्वे—सभी; भवता—आपके द्वारा; अनुभाविता:—प्रबुद्ध तथा अधिकारप्राप्त; विभावयाम:—हम प्रकट करते तथा उत्पन्न करते हैं; भुवनानि—जगतों को; सप्त— सात ।.
 
अनुवाद
 
 हे असीम शक्ति के स्वामी, इस भौतिक जगत में आपका वर्तमान अवतार न्याय के सिद्धान्तों की रक्षा करने तथा समग्र ब्रह्माण्ड को लाभ दिलाने के निमित्त है। हममें से प्रत्येक देवता आपकी कृपा तथा सत्ता पर आश्रित है और हम सभी देवता सात लोक मण्डलों को उत्पन्न करते हैं।
 
तात्पर्य
 एक ऐतिहासिक व्यक्ति की तरह जब शिवजी कृष्ण की स्तुति कर रहे हैं, तो एक संदेह उठ सकता है क्योंकि बाहरी तौर पर कृष्ण मनुष्य जैसे स्वरूप में शिव के समक्ष खड़े हैं। किन्तु यह तो भगवान् की अहैतुकी कृपा है कि वे हमारी मानवी आँखों के लिए दृश्य रूप में
प्रकट होते हैं। यदि हम परम सत्य श्रीकृष्ण को समझना चाहते हैं, तो हमें चाहिए कि कृष्णभावनाभावित के किसी मान्य अधिकारी से सुनें यथा भगवद्गीता में साक्षात् कृष्ण से या मान्य वैष्णव अधिकारी शिव से सुनें जो यहाँ भगवान् की स्तुति कर रहे हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥