श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 40

 
श्लोक
यन्मायामोहितधिय: पुत्रदारगृहादिषु ।
उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति प्रसक्ता वृजिनार्णवे ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसकी; माया—माया से; मोहित—मोहित; धिय:—उनकी बुद्धि; पुत्र—पुत्र; दार—पत्नी; गृह—घर; आदिषु—इत्यादि में; उन्मज्जन्ति—वे ऊपर उठ आते हैं; निमज्जन्ति—डूब जाते हैं; प्रसक्ता:—पूरी तरह फँसे हुए; वृजिन—दुख के; अर्णवे—समुद्र में ।.
 
अनुवाद
 
 आपकी माया से मोहित बुद्धि वाले अपने बच्चों, पत्नी, घर इत्यादि में पूरी तरह से लिप्त और भौतिक दुख के सागर में निमग्न लोग कभी ऊपर उठते हैं, तो कभी नीचे डुब जाते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी बतलाते हैं कि उन्मज्जन्ति सूचक है उच्चतर योनियों—यथा देव योनि में उत्थान और निमज्जन्ति द्योतक है निम्न योनियों—जड़ जीवन यथा वृक्षों का। जैसाकि वायु पुराण में कहा गया है—विपर्ययश्च भवति ब्रह्मत्वस्थावरत्वयो:—जीव ब्रह्मा से लेकर जड़ प्राणी तक के बीच चक्कर लगाता रहता है।
श्रील जीव गोस्वामी इंगित करते हैं कि भगवान् की स्तुति कर चुकने के बाद शिवजी अब बाणासुर के लिए भगवान् की कृपा प्राप्त करने की मूल इच्छा के विषय को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रक्रार इस श्लोक में तथा अगले चार श्लोकों में शिवजी बाणासुर को भगवान् के साथ उसकी वास्तविक स्थिति का उपदेश देते हैं। बाण के लिए शिव द्वारा दया की याचना श्लोक ४५ में मिलती है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥