श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 44

 
श्लोक
तं त्वा जगत्स्थित्युदयान्तहेतुं
समं प्रशान्तं सुहृदात्मदैवम् ।
अनन्यमेकं जगदात्मकेतं
भवापवर्गाय भजाम देवम् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको; त्वा—तुम; जगत्—ब्रह्माण्ड के; स्थिति—पालन; उदय—उत्थान; अन्त—तथा मृत्यु; हेतुम्—कारण; समम्— समभाव; प्रशान्तम्—परम शान्त; सुहृत्—मित्र; आत्म—आत्मा; दैवम्—तथा पूज्य स्वामी; अनन्यम्—अद्वितीय; एकम्— अनोखा; जगत्—जगतों के; आत्म—तथा सारे जीवों के; केतम्—आश्रय; भव—भौतिक जीवन के; अपवर्गाय—समाप्ति (मुक्ति) के लिए; भजाम—हम पूजा करें; देवम्—भगवान् की ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, भौतिक जीवन से मुक्त होने के लिए हम आपकी पूजा करते हैं। आप ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता और इसके सृजन तथा मृत्यु के कारण हैं। आप समभाव तथा पूर्ण शान्त, असली मित्र, आत्मा तथा पूज्य स्वामी हैं। आप अद्वितीय हैं और समस्त जगतों तथा जीवों के आश्रय हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी कहते हैं कि भगवान् असली मित्र हैं क्योंकि वे उस व्यक्ति की उचित बुद्धि को गति प्रदान करते हैं, जो ईश्वर तथा आत्मा के विषय में सत्य जानना चाहता है। श्रील जीव गोस्वामी तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बल देते हैं कि भवापवर्गाय शब्द शुद्ध भगवत्प्रेम की सर्वोच्च मुक्ति का सूचक है।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती यह भी बतलाते हैं कि भगवान् समम् हैं—पूर्णतया विषयनिष्ठ और सन्तुलित हैं जबकि अन्य सारे जीव वास्तविकता को पूरी तरह न समझने के कारण कभी भी विषयनिष्ठ नहीं हो सकते। जो लोग भगवान् की शरण ग्रहण करते हैं, वे भी भगवान् की चरम चेतना का आश्रय लेकर समम् बन जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥