श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 46

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
यदात्थ भगवंस्त्वं न: करवाम प्रियं तव ।
भवतो यद् व्यवसितं तन्मे साध्वनुमोदितम् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; यत्—जो; आत्थ—कहा है; भगवन्—हे प्रभु; त्वम्—तुमने; न:—हम पर; करवाम— हमें करना चाहिए; प्रियम्—सन्तोषप्रद, सुखकर; तव—तुम्हारा; भवत:—आपके द्वारा; यत्—जो; व्यवसितम्—निश्चित; तत्—वह; मे—मेरे द्वारा; साधु—उत्तम; अनुमोदितम्—सहमति व्यक्त की गई ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे प्रभु, आपकी प्रसन्नता के लिए हमें अवश्य ही वह करना चाहिए जिसके लिए आपने हमसे प्रार्थना की है। मैं आपके निर्णय से पूरी तरह सहमत हूँ।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर भगवान् कृष्ण द्वारा शिव को भगवान् कह कर सम्बोधित किया जाना हमें विचित्र नहीं लगना चाहिए। सारी वस्तुएँ भगवान् की विभिन्नांश हैं, गुणात्मक दृष्टि से वे उनसे अभिन्न हैं और शिवजी विशेष रूप से शक्तिमान शुद्ध जीव हैं जिनमें भगवान् के अनेक गुण पाये जाते हैं। जिस प्रकार पिता बड़ी ही खुशी के साथ अपने प्रिय पुत्र को अपनी सम्पत्ति में साझीदार बना लेता
है उसी तरह भगवान् प्रसन्नतापूर्वक शुद्ध जीवों को अपनी कुछ शक्ति तथा ऐश्वर्य दे देते हैं। जिस तरह पिता बड़े ही गर्व तथा खुशी से अपने पुत्रों के सद्गुणों का अवलोकन करता है उसी तरह भगवान् कृष्णभावनामृत में प्रबल शुद्ध जीवों की बड़ाई करने में अतीव प्रसन्न होते हैं। परमेश्वर इसीलिए शिवजी को भगवान् कह कर सम्बोधित करके बड़ाई करने में प्रसन्न होते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥