श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 48

 
श्लोक
दर्पोपशमनायास्य प्रवृक्णा बाहवो मया ।
सूदितं च बलं भूरि यच्च भारायितं भुव: ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
दर्प—मिथ्या गर्व; उपशमनाय—दमन करने के लिए; अस्य—उसका; प्रवृक्णा:—काटे हुए; बाहव:—भुजाएँ; मया—मेरे द्वारा; सूदितम्—मारी गयी; च—तथा; बलम्—सेना; भूरि—विशाल; यत्—जो; च—तथा; भारायितम्—भार बन जाने से; भुव:— पृथ्वी के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 मैंने बाणासुर के मिथ्या गर्व का दमन करने के लिए ही इसकी भुजाएँ काट दी हैं। और मैंने इसकी विशाल सेना का वध किया है क्योंकि वह पृथ्वी पर भार बन चुकी थी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥