श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 52

 
श्लोक
स्वराजधानीं समलङ्‍कृतां ध्वजै:
सतोरणैरुक्षितमार्गचत्वराम् ।
विवेश शङ्खानकदुन्दुभिस्वनै-
रभ्युद्यत: पौरसुहृद्‌‌द्विजातिभि: ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
स्व—अपनी; राजधानीम्—राजधानी को; समलङ्कृताम्—पूरी तरह सजायी गयी; ध्वजै:—झंडियों से; स—तथा सहित; तोरणै:—विजय तोरणों; उक्षित—पानी से छिडक़ाव किये गये; मार्ग—जिसके रास्ते; चत्वराम्—तथा चौराहे; विवेश—प्रवेश किया; शङ्ख—शंख; आनक—ढोल; दुन्दुभि—तथा नगाड़ों की; स्वनै:—गूँज से; अभ्युद्यत:—सत्कार किया गया; पौर— नगरवासियों द्वारा; सुहृत्—अपने सम्बन्धियों द्वारा; द्विजातिभि:—तथा ब्राह्मणों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् भगवान् अपनी राजधानी में प्रविष्ट हुए। नगर को झंडियों तथा विजय तोरणों से खूब सजाया गया था और इसकी गलियों तथा चौराहों पर पानी छिडक़वाया गया था। ज्योंही शंख, आनक तथा दुन्दुभियाँ गूँजने लगीं त्योंही भगवान् के सम्बन्धी, ब्राह्मण तथा जनता के लोग उनका स्वागत करने के लिए आगे आये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥