श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  »  श्लोक 6

 
श्लोक
बाणार्थे भगवान् रुद्र: ससुत: प्रमथैर्वृत: ।
आरुह्य नन्दिवृषभं युयुधे रामकृष्णयो: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
बाण-अर्थे—बाण के लिए; भगवान् रुद्र:—शिवजी ने; स-सुत:—पुत्र (कार्तिकेय, जो कि देव-सेना के सेनापति हैं) सहित; प्रमथै:—प्रमथों (योगीजन जो कई रूपों में शिवजी की सेवा करते हैं) सहित; वृत:—संग में लेकर; आरुह्य—चढ़ कर; नन्दि—नन्दि पर; वृषभम्—अपने बैल; युयुधे—युद्ध किया; राम-कृष्णयो:—बलराम तथा कृष्ण से ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् रुद्र अपने पुत्र कार्तिकेय तथा प्रमथों को साथ लेकर बाणासुर के पक्ष में बलराम तथा कृष्ण से लडऩे के लिए अपने बैल-वाहन नन्दि पर सवार होकर आये।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी इंगित करते हैं कि यहाँ पर भगवान् शब्द यह सूचित कराने के लिए प्रयुक्त हुआ है कि शिवजी स्वभाव से सर्वज्ञ हैं और इस तरह वे भगवान् कृष्ण की महानता से भलीभाँति अवगत हैं। फिर भी, यह जानते हुए कि भगवान् कृष्ण उन्हें हरा देंगे वे भगवान् की महिमा का प्रदर्शन करने के लिए उनके विरुद्ध युद्ध करने आये। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि शिवजी दो कारणों से युद्ध करने आये: पहला— भगवान् कृष्ण के आनन्द तथा उत्साहवर्धन के लिए और दूसरा—यह प्रदर्शित करने कि कृष्ण रूप में भगवान्
का अवतार अन्य अवतारों से—यथा भगवान् रामचन्द्र से श्रेष्ठ है यद्यपि वे मनुष्य की भाँति लीलाएँ करते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती यह भी बतलाते हैं कि कृष्ण की अन्तरंगा शक्ति योगमाया ने शिवजी को उसी तरह मोहित किया जिस तरह ब्रह्मा को किया था। अपने कथन के समर्थन में आचार्य ने भक्तिरसामृत सिन्धु से ब्रह्मरुद्रादिमोहनम् पद उद्धृत किया है। निस्सन्देह योगमाया का कार्य भगवान् की लीलाओं के लिए उत्तम व्यवस्था करना है। इस तरह शिवजी भगवान् कृष्ण से युद्ध करने के लिए उत्साहित हो गए।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥