श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 63: बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में कृष्ण तथा शिव के बीच युद्ध का एवं कृष्ण द्वारा बाणासुर की भुजाएँ काटे जाने के बाद शिव द्वारा कृष्ण की स्तुति का विवरण दिया हुआ है।
जब अनिरुद्ध शोणितपुर से नहीं लौटा तो उसके परिवार वालों तथा मित्रों ने वर्षा के चातुर्मास बड़े ही कष्ट में बिताये। जब अन्त में उन्होंने नारदमुनि से सुना कि किस तरह अनिरुद्ध बन्दी बना लिया गया है, तो कृष्ण के संरक्षण में यादव योद्धाओं की एक विशाल सेना बाणासुर की राजधानी के लिए रवाना हो गई और उसने जाकर घेरा डाल दिया। बाणासुर ने अपनी उतनी ही बड़ी सेना से उसका पुरजोर मुकाबला किया। बाणासुर की सहायता के लिए शिवजी, कार्तिकेय तथा योगियों की टोली लेकर, बलराम तथा कृष्ण से लडऩे आये। बाण सात्यकि से और बाण का पुत्र साम्ब से लडऩे लगा। सारे देवता आकाश में युद्ध देखने के लिए एकत्र हो गये। भगवान् कृष्ण ने अपने बाणों से शिवजी के अनुयायियों को तंग करना शुरू कर दिया। इस तरह शिवजी को दुविधा में डाल कर वे बाणासुर की सेना का सफाया कर सके। प्रद्युम्न ने कार्तिकेय की इतनी बुरी तरह से पिटाई की कि वे युद्धभूमि छोड़ कर भाग गये और बाणासुर की सेना के शेष सैनिक बलराम की गदा के प्रहारों से नष्ट-भ्रष्ट होकर चारों दिशाओं में तितर-बितर हो गये।

अपनी सेना का विनाश देख कर बाणासुर कृष्ण पर आक्रमण करने के लिए तेजी से बढ़ा। किन्तु भगवान् ने बाण के सारथी को तत्काल मार डाला और उसके रथ तथा धनुष को तोड़ डाला। तत्पश्चात् उन्होंने अपना पञ्चजन्य शंख बजा दिया। इसके बाद अपने पुत्र की रक्षा करने के उद्देश्य से बाणासुर की माता कृष्ण के समक्ष नंगी होकर आई जिन्होंने उसे देखने से बचने के लिए अपना मुख मोड़ लिया। इस अवसर का लाभ उठाकर बाण अपनी नगरी को भाग गया।

जब भगवान् कृष्ण शिवजी की सेना के भूतप्रेतों को पूरी तरह परास्त कर चुके तो कृष्ण से लडऩे के लिए शिवज्वर नामक हथियार आया—इसके तीन सिर तथा तीन पाँव थे और यह ज्वर का साक्षात् रूप था। शिवज्वर को आते देख कृष्ण ने अपना विष्णुज्वर छोड़ा। शिवज्वर विष्णुज्वर से परास्त हो गया और कहीं भी शरण न पाकर कृष्ण से दया की भीख माँगने के लिए उनकी स्तुति करने लगा। भगवान् कृष्ण शिवज्वर से प्रसन्न हो गये और उसे भय से मुक्त करने का वचन दिया। तब उसने कृष्ण को नमस्कार किया और चलता बना।

इसके बाद बाणासुर लौटा और अपने एक हजार हाथों में नाना प्रकार के हथियार लेकर उसने कृष्ण पर पुन: आक्रमण कर दिया। किन्तु भगवान् कृष्ण ने अब अपना सुदर्शन चक्र सँभाला और उस असुर के सभी हाथों को काटना शुरू कर दिया। तब शिवजी बाणासुर के प्राणों की रक्षा के लिए कृष्ण के पास पहुँचे और जब कृष्ण उसे जीवनदान देने के लिए तैयार हो गये तो उन्होंने शिवजी से कहा, “बाणासुर का जन्म प्रह्लाद महाराज के कुल में हुआ है, अत: यह मरने के योग्य नहीं है। मैंने इसका मिथ्या गर्व विनष्ट करने के लिए उसकी चार बाहें छोडक़र शेष सारी भुजाएँ काट दी हैं और मैंने पृथ्वी पर उसकी भारस्वरूप सेना का संहार कर दिया है। अब वह बुढ़ापा तथा मृत्यु से मुक्त हो जायेगा और निर्भय रहते हुए आपका मुख्य सेवक रहेगा।”

जब बाणासुर आश्वस्त हो गया कि उसे कोई भय नहीं है, तो उसने कृष्ण को नमस्कार किया और उषा तथा अनिरुद्ध को विवाह-रथ पर चढ़ाकर कृष्ण के समक्ष ले आया। तब कृष्ण जुलूस के आगे- आगे अनिरुद्ध तथा उसकी दुलहन को लेकर द्वारका के लिए रवाना हो गये। जब वे नवदम्पति भगवान् की राजधानी पहुँचे तो नागरिकों, भगवान् के परिवारजनों एवं ब्राह्मणों ने उनका अभिनन्दन किया।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥