श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  » 
 
 
 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में शकट भंजन, तृणावर्त असुर का वध तथा श्रीकृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर सारे ब्रह्माण्ड का प्रदर्शन नामक श्रीकृष्ण लीलाओं का वर्णन किया गया है। जब...
 
श्लोक 1-2:  राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु शुकदेव गोस्वामी, भगवान् के अवतारों द्वारा प्रदर्शित विविध लीलाएँ निश्चित रूप से कानों को तथा मन को सुहावनी लगने वाली हैं। इन लीलाओं के श्रवणमात्र से मनुष्य के मन का मैल तत्क्षण धुल जाता है। सामान्यतया हम भगवान् की लीलाओं को सुनने में आनाकानी करते हैं किन्तु कृष्ण की बाल-लीलाएँ इतनी आकर्षक हैं कि वे स्वत:ही मन तथा कानों को सुहावनी लगती हैं। इस तरह भौतिक वस्तुओं के विषय में सुनने की अनुरक्ति, जो भवबन्धन का मूल कारण है, समाप्त हो जाती है। मनुष्य में धीरे धीरे भगवान् के प्रति भक्ति एवं अनुरक्ति उत्पन्न होती है और भक्तों के साथ जो हमें कृष्णभावनामृत का योगदान देते हैं, मैत्री बढ़ती है। यदि आप उचित समझते हैं, तो कृपा करके भगवान् की इन लीलाओं के विषय में कहें।
 
श्लोक 3:  कृपया भगवान् कृष्ण की अन्य लीलाओं का वर्णन करें जो मानवी बालक का अनुकरण करके और पूतना वध जैसे अद्भुत कार्यकलाप करते हुए इस पृथ्वी-लोक में प्रकट हुए।
 
श्लोक 4:  शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब यशोदा का नन्हा शिशु उठने तथा करवट बदलने का प्रयत्न करने लगा तो वैदिक उत्सव मनाया गया। ऐसे उत्सव में, जिसे उत्थान कहा जाता है और जो बालक द्वारा घर से पहली बार बाहर निकलने के अवसर पर मनाया जाता है, बालक को ठीक से नहलाया जाता है। जब कृष्ण तीन मास के पूरे हुए तो माता यशोदा ने पड़ोस की अन्य औरतों के साथ इस उत्सव को मनाया। उस दिन चन्द्रमा तथा रोहिणी नक्षत्र का योग था। इस महोत्सव को माता यशोदा ने ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्र के उच्चारण तथा पेशेवर गायकों के सहयोग से सम्पन्न किया।
 
श्लोक 5:  बच्चे का स्नान उत्सव पूरा हो जाने के बाद माता यशोदा ने ब्राह्मणों का स्वागत किया और उनको प्रचुर अन्न तथा अन्य भोज्य पदार्थ, वस्त्र, वांछित गौवें तथा मालाएँ भेंट करके उनकी उचित सम्मान के साथ पूजा की। ब्राह्मणों ने इस शुभ उत्सव पर उचित रीति से वैदिक मंत्र पढ़े। जब मंत्रोच्चार समाप्त हुआ और माता यशोदा ने देखा कि बालक उनींदा हो रहा है, तो वे उसे लेकर बिस्तर पर तब तक लेटी रहीं जब तक वह शान्त होकर सो नहीं गया।
 
श्लोक 6:  उत्थान उत्सव मनाने में मग्न उदार माता यशोदा मेहमानों का स्वागत करने, आदर-सहित उनकी पूजा करने तथा उन्हें वस्त्र, गौवें, मालाएँ और अन्न भेंट करने में अत्यधिक व्यस्त थीं। अत: वे बालक के रोने को नहीं सुन पाईं। उस समय बालक कृष्ण अपनी माता का दूध पीना चाहता था अत: क्रोध में आकर वह अपने पाँव ऊपर की ओर उछालने लगा।
 
श्लोक 7:  श्रीकृष्ण आँगन के एक कोने में छकड़े के नीचे लेटे हुए थे और यद्यपि उनके पाँव कोंपलों की तरह कोमल थे किन्तु जब उन्होंने अपने पाँवों से छकड़े पर लात मारी तो वह भड़भड़ा कर उलटने से टूट-फूट गया। पहिए धुरे से विलग हो गये और बिखर गये और गाड़ी का लट्ठा टूट गया। इस गाड़ी पर रखे सब छोटे-छोटे धातु के बर्तन-भांडे इधर-उधर छितरा गये।
 
श्लोक 8:  जब यशोदा तथा उत्थान उत्सव के अवसर पर जुटी स्त्रियों तथा नन्द महाराज इत्यादि सभी पुरुषों ने यह अद्भुत दृश्य देखा तो वे आश्चर्य करने लगे कि यह छकड़ा किस तरह अपने आप चूर चूर हो गया है। वे इसका कारण ढूँढने के लिए इधर-उधर घूमने लगे किन्तु कुछ भी तय न कर पाये।
 
श्लोक 9:  वहाँ पर जुटे ग्वाले तथा गोपियाँ सोचने लगे कि यह घटना कैसे घटी? वे पूछने लगे, “कहीं यह किसी असुर या अशुभ ग्रह का काम तो नहीं है?” उस समय वहाँ पर उपस्थित बालकों ने स्पष्ट कहा कि बालक कृष्ण ने ही इस छकड़े को लात से मार कर दूर फेंका है। रोते बालक ने ज्योंही छकड़े के पहिये पर अपने पाँव मारे त्योंही पहिये सहित छकड़ा ध्वस्त हो गया। इसमें कोई सन्देह नहीं है।
 
श्लोक 10:  वहाँ एकत्र गोपियों तथा गोपों को यह विश्वास नहीं हुआ कि बालक कृष्ण में इतनी अचिन्त्य शक्ति हो सकती है क्योंकि वे इस तथ्य से अवगत नहीं थे कि कृष्ण सदैव असीम हैं। उन्हें बालकों की बातों पर विश्वास नहीं हुआ अतएव उन्हें बच्चों की भोली-भाली बातें जानकर, उन्होंने उनकी उपेक्षा की।
 
श्लोक 11:  यह सोच कर कि कृष्ण पर किसी अशुभ ग्रह का आक्रमण हुआ है, माता यशोदा ने रोते बालक को उठा लिया और उसे अपना स्तन-पान कराया। तब उन्होंने वैदिक स्तुतियों का उच्चारण करने के लिए तथा शुभ अनुष्ठान सम्पन्न करने के लिए अनुभवी ब्राह्मणों को बुला भेजा।
 
श्लोक 12:  जब बलिष्ठ गठीले ग्वालों ने बर्तन-भांडे तथा अन्य सामग्री को छकड़े के ऊपर पहले की भाँति व्यवस्थित कर दिया, तो ब्राह्मणों ने बुरे ग्रह को शान्त करने के लिए अग्नि-यज्ञ का अनुष्ठान किया और तब चावल, कुश, जल तथा दही से भगवान् की पूजा की।
 
श्लोक 13-15:  जब ब्राह्मणजन ईर्ष्या, झूठ, मिथ्या अहंकार, द्वेष, अन्यों के वैभव को देखकर मचलने तथा मिथ्या प्रतिष्ठा से मुक्त होते हैं, तो उनके आशीर्वाद व्यर्थ नहीं जाते। यह सोचकर नन्द महाराज ने गम्भीर होकर कृष्ण को अपनी गोद में ले लिया और इन सत्यनिष्ठ ब्राह्मणों को साम, ऋग् तथा यजुर्वेद के पवित्र स्तोत्रों के अनुसार अनुष्ठान सम्पन्न करने के लिए आमंत्रित किया। जब मंत्रोच्चार हो रहा था, तो नन्द ने बच्चे को शुद्ध जड़ी-बूटियों से मिश्रित जल से स्नान कराया और अग्नि-यज्ञ करने के बाद सभी ब्राह्मणों को उत्तम अन्न तथा अन्य प्रकार के पदार्थों का स्वादिष्ट भोजन कराया।
 
श्लोक 16:  नन्द महाराज ने अपने पुत्र के धन-वैभव हेतु ब्राह्मणों को गौवें दान में दीं जो वस्त्रों, फूल- मालाओं तथा सुनहरे हारों से सजाई गई थीं। ये गौवें जो प्रचुर दूध देने वाली थीं ब्राह्मणों को दान में दी गई थीं और ब्राह्मणों ने उन्हें स्वीकार किया। बदले में उन्होंने समूचे परिवार को तथा विशेष रूप से कृष्ण को आशीर्वाद दिया।
 
श्लोक 17:  वैदिक मंत्रों के उच्चारण में पूरी तरह से पटु ब्राह्मण योगशक्तियों से सम्पन्न योगी थे। वे जो भी आशीर्वाद देते वह कभी निष्फल नहीं जाता था।
 
श्लोक 18:  एक दिन, कृष्ण के आविर्भाव के एक वर्ष बाद, माता यशोदा अपने पुत्र को अपनी गोद में दुलार रही थीं। तभी सहसा उन्हें वह बालक पर्वत की चोटी से भी भारी लगने लगा, जिससे वे उसका भार सहन नहीं कर पाईं।
 
श्लोक 19:  बालक को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के बराबर भारी अनुभव करते हुए अतएव यह सोचते हुए कि बालक को कोई दूसरा भूत-प्रेत या असुर सता रहा है, चकित माता यशोदा ने बालक को जमीन पर रख दिया और नारायण का चिंतन करने लगीं। उत्पात की आशंका से उन्होंने इस भारीपन के शमन हेतु ब्राह्मणों को बुला भेजा और फिर घर के कामकाज में लग गईं। उनके पास नारायण के चरणकमलों को स्मरण करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प न था क्योंकि वे यह नहीं समझ पाईं कि कृष्ण ही हर वस्तु के मूल स्रोत हैं।
 
श्लोक 20:  जब बालक जमीन पर बैठा हुआ था, तो तृणावर्त नामक असुर, जो कंस का दास था, वहाँ पर कंस के बहकाने पर बवंडर के रूप में आया और बड़ी आसानी से बालक को अपने साथ उड़ाकर आकाश में ले गया।
 
श्लोक 21:  उस असुर ने प्रबल बवंडर के रूप में सारे गोकुल प्रदेश को धूल के कणों से ढकते हुए सभी लोगों की दृष्टि ढक ही ली और भयावनी आवाज करता हुआ सारी दिशाओं को कँपाने लगा।
 
श्लोक 22:  क्षण-भर के लिए समूचा चरागाह धूल भरी अंधड़ के घने अंधकार से ढक गया और माता यशोदा अपने पुत्र को उस स्थान में न पा सकीं जहाँ उसे बिठाया था।
 
श्लोक 23:  तृणावर्त द्वारा फेंके गये बालू के कणों के कारण लोग न तो स्वयं को देख सकते थे न अन्य किसी और को। इस तरह वे मोहित तथा विचलित थे।
 
श्लोक 24:  प्रबल बवंडर से उठे अंधड़ के कारण माता यशोदा न तो अपने पुत्र का कोई पता लगा सकीं, न ही कोई कारण समझ पाईं। वे जमीन पर इस तरह गिर पड़ीं मानों किसी गाय ने अपना बछड़ा खो दिया हो। वे अत्यन्त करुण-भाव से विलाप करने लगीं।
 
श्लोक 25:  जब अंधड़ तथा बवंडर का वेग घट गया, तो यशोदा का करुण क्रन्दन सुनकर उनकी सखियाँ—गोपियाँ—उनके पास आईं। किन्तु वे भी कृष्ण को वहाँ न देखकर अत्यन्त उद्विग्न हुईं और आँखों में आँसू भर कर माता यशोदा के साथ वे भी रोने लगीं।
 
श्लोक 26:  तृणावर्त असुर वेगवान बवंडर का रूप धारण करके कृष्ण को आकाश में बहुत ऊँचाई तक ले गया किन्तु जब कृष्ण असुर से भारी हो गये तो असुर का वेग रुक गया जिससे वह और आगे नहीं जा सका।
 
श्लोक 27:  कृष्ण के भार के कारण तृणावर्त उन्हें विशाल पर्वत या लोह का पिंड मान रहा था। किन्तु कृष्ण ने असुर की गर्दन पकड़ रखी थी इसलिए वह उन्हें फेंक नहीं पा रहा था। इसलिए उसने सोचा कि यह बालक अद्भुत है, जिसके कारण मैं न तो उसे ले जा सकता हूँ न ही इस भार को दूर फेंक सकता हूँ।
 
श्लोक 28:  कृष्ण ने तृणावर्त को गले से पकड़ रखा था इसलिए उसका दम घुट रहा था जिससे वह न तो कराह सकता था, न ही अपने हाथ-पैर हिला-डुला सकता था। उसकी आँखें बाहर निकल आईं थी, उसके प्राण निकल गये और वह उस छोटे बालक सहित व्रज की भूमि पर नीचे आ गिरा।
 
श्लोक 29:  जब वहाँ एकत्र गोपियाँ कृष्ण के लिए रो रही थीं तो वह असुर आकाश से पत्थर की एक बड़ी चट्टान पर आ गिरा, जिससे उसके सारे अंग छिन्न-भिन्न हो गये मानो भगवान् शिवजी के बाण से बेधा गया त्रिपुरासुर हो।
 
श्लोक 30:  गोपियों ने तुरन्त ही कृष्ण को असुर की छाती से उठाकर माता यशोदा को लाकर सौंप दिया। वे समस्त अशुभों से मुक्त थे। चूँकि बालक को असुर द्वारा आकाश में ले जाये जाने पर भी किसी प्रकार की चोट नहीं आई थी और वह अब सारे खतरों तथा दुर्भाग्य से मुक्त था इसलिए नन्द महाराज समेत सारे ग्वाले तथा गोपियाँ अत्यन्त प्रसन्न थे।
 
श्लोक 31:  यह सबसे अधिक आश्चर्य की बात है कि यह अबोध बालक इस राक्षस द्वारा खाये जाने के लिए दूर ले जाया जाकर भी बिना मारे या चोट खाये वापस लौट आया। चूँकि राक्षस ईर्ष्यालु, क्रूर तथा पापी था, इसलिए वह अपने पापपूर्ण कृत्यों के लिए मारा गया। यही प्रकृति का नियम है। निर्दोष भक्त की रक्षा सदैव भगवान् द्वारा की जाती है और पापी व्यक्ति को अपने पापमय जीवन के लिए दण्ड दिया जाता है।
 
श्लोक 32:  नन्द महाराज तथा अन्य लोगों ने कहा : हमने अवश्य ही पूर्वजन्म में दीर्घकाल तक तपस्या की होगी, भगवान् की पूजा की होगी, जनता के लिए सडक़ें तथा कुएँ बनवाकर पुण्य कर्म किये होंगे और दान भी दिया होगा जिसके फलस्वरूप मृत्यु के मुख में गया हुआ यह बालक अपने सम्बन्धियों को आनन्द प्रदान करने के लिए लौट आया है।
 
श्लोक 33:  बृहद्वन में इन सारी घटनाओं को देखकर नन्द महाराज अधिकाधिक आश्चर्यचकित हुए और उन्हें वसुदेव के वे शब्द स्मरण हो आये जो उन्होंने मथुरा में कहे थे।
 
श्लोक 34:  एक दिन माता यशोदा कृष्ण को अपनी गोद में बैठाकर उन्हें मातृ-स्नेह के कारण अपने स्तन से दूध पिला रही थीं। दूध उनके स्तन से चू रहा था और बालक उसे पी रहा था।
 
श्लोक 35-36:  हे राजा परीक्षित, जब बालक कृष्ण अपनी माता का दूध पीना लगभग बन्द कर चुके थे और माता यशोदा उनके सुन्दर कान्तिमान हँसते मुख को छू रही थीं और निहार रही थीं तो बालक ने जम्हाई ली और माता यशोदा ने देखा कि उनके मुँह में पूरा आकाश, उच्च लोक तथा पृथ्वी, सभी दिशाओं के तारे, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, समुद्र, द्वीप, पर्वत, नदी, जंगल तथा चर-अचर सभी प्रकार के जीव समाये हुए हैं।
 
श्लोक 37:  जब यशोदा माता ने अपने पुत्र के मुखारविन्द में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखा तो उनका हृदय धक् धक् करने लगा तथा आश्चर्यचकित होकर वे अपने अधीर नेत्र बन्द करना चाह रहती थीं।
 
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