श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 19

 
श्लोक
भूमौ निधाय तं गोपी विस्मिता भारपीडिता ।
महापुरुषमादध्यौ जगतामास कर्मसु ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
भूमौ—जमीन पर; निधाय—रख कर; तम्—उस बालक को; गोपी—माता यशोदा; विस्मिता—चकित; भार-पीडिता—बच्चे के भार से दुखित; महा-पुरुषम्—विष्णु या नारायण को; आदध्यौ—शरण ली; जगताम्—मानो सारे जगत का भार हो; आस—अपने को व्यस्त किया; कर्मसु—घर के अन्य कामों में ।.
 
अनुवाद
 
 बालक को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के बराबर भारी अनुभव करते हुए अतएव यह सोचते हुए कि बालक को कोई दूसरा भूत-प्रेत या असुर सता रहा है, चकित माता यशोदा ने बालक को जमीन पर रख दिया और नारायण का चिंतन करने लगीं। उत्पात की आशंका से उन्होंने इस भारीपन के शमन हेतु ब्राह्मणों को बुला भेजा और फिर घर के कामकाज में लग गईं। उनके पास नारायण के चरणकमलों को स्मरण करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प न था क्योंकि वे यह नहीं समझ पाईं कि कृष्ण ही हर वस्तु के मूल स्रोत हैं।
 
तात्पर्य
 माता यशोदा यह नहीं समझ पाईं कि कृष्ण वस्तुओं में से सबसे भारी हैं और वे सबों के भीतर निवास करते हैं (मत्स्थानि सर्वभूतानि )। भगवद्गीता (९.४) में पुष्टि की गई है—मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना—कृष्ण अपने निर्विशेष रूप में सर्वत्र विद्यमान हैं और सारी वस्तुएँ उन्हीं पर टिकी हैं। फिर भी—न चाहं तेष्ववस्थित:—कृष्ण
सर्वत्र नहीं रहते। माता यशोदा इस दर्शन को नहीं समझती थीं क्योंकि योगमाया की योजनानुसार वे कृष्ण की माता के रूप में उनके साथ व्यवहार कर रही थीं। कृष्ण की महत्ता को न समझ सकने से वे कृष्ण की सुरक्षा के लिए केवल नारायण की शरण ले सकती थीं और इस दशा के शमन हेतु ब्राह्मणों को बुला सकती थीं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥