श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 20

 
श्लोक
दैत्यो नाम्ना तृणावर्त: कंसभृत्य: प्रणोदित: ।
चक्रवातस्वरूपेण जहारासीनमर्भकम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
दैत्य:—दूसरा असुर; नाम्ना—नाम वाला; तृणावर्त:—तृणावर्त; कंस-भृत्य:—कंस का दास; प्रणोदित:—उसके द्वारा प्रेरित; चक्रवात-स्वरूपेण—बवंडर के रूप में; जहार—उड़ा ले गया; आसीनम्—बैठे हुए; अर्भकम्—बालक को ।.
 
अनुवाद
 
 जब बालक जमीन पर बैठा हुआ था, तो तृणावर्त नामक असुर, जो कंस का दास था, वहाँ पर कंस के बहकाने पर बवंडर के रूप में आया और बड़ी आसानी से बालक को अपने साथ उड़ाकर आकाश में ले गया।
 
तात्पर्य
 कृष्ण का भारीपन माता के लिए असह्य था किन्तु जब तृणावर्तासुर आया तो वह उन्हें तुरन्त उड़ा ले गया। यह कृष्ण की अचिन्त्य शक्ति का दूसरा
प्रदर्शन था। जब तृणावर्त आया तो कृष्ण तिनके से भी अधिक हल्के हो गये जिससे वह उन्हें उड़ा ले जा सके। यह उनका आनन्दचिन्मय रस था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥