श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 24

 
श्लोक
इति खरपवनचक्रपांशुवर्षे
सुतपदवीमबलाविलक्ष्य माता ।
अतिकरुणमनुस्मरन्त्यशोचद्
भुवि पतिता मृतवत्सका यथा गौ: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; खर—अत्यन्त प्रचंड; पवन-चक्र—बवंडर से; पांशु-वर्षे—धूल-कणों की वर्षा होने पर; सुत-पदवीम्— अपने पुत्र के स्थान को; अबला—बेचारी स्त्री; अविलक्ष्य—न देखकर; माता—उसकी माता होने से; अति-करुणम्—अत्यन्त कारुणिक; अनुस्मरन्ती—अपने पुत्र का चिन्तन करती हुई; अशोचत्—अत्यधिक विलाप किया; भुवि—भूमि पर; पतिता— गिर गई; मृत-वत्सका—अपने बछड़े को खोकर; यथा—जिस तरह; गौ:—गाय ।.
 
अनुवाद
 
 प्रबल बवंडर से उठे अंधड़ के कारण माता यशोदा न तो अपने पुत्र का कोई पता लगा सकीं, न ही कोई कारण समझ पाईं। वे जमीन पर इस तरह गिर पड़ीं मानों किसी गाय ने अपना बछड़ा खो दिया हो। वे अत्यन्त करुण-भाव से विलाप करने लगीं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥