श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 28

 
श्लोक
गलग्रहणनिश्चेष्टो दैत्यो निर्गतलोचन: ।
अव्यक्तरावो न्यपतत्सहबालो व्यसुर्व्रजे ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
गल-ग्रहण-निश्चेष्ट:—कृष्ण द्वारा गला पकड़े रहने से तृणावर्त का गला घुट रहा था और वह कुछ भी नहीं कर सका; दैत्य:— असुर; निर्गत-लोचन:—दबाव से आँखें बाहर निकल आईं; अव्यक्त-राव:—गला घुटने से उसकी कराह भी नहीं निकल पायी; न्यपतत्—गिर पड़ा; सह-बाल:—बालक सहित; व्यसु: व्रजे—व्रज की भूमि पर निर्जीव ।.
 
अनुवाद
 
 कृष्ण ने तृणावर्त को गले से पकड़ रखा था इसलिए उसका दम घुट रहा था जिससे वह न तो कराह सकता था, न ही अपने हाथ-पैर हिला-डुला सकता था। उसकी आँखें बाहर निकल आईं थी, उसके प्राण निकल गये और वह उस छोटे बालक सहित व्रज की भूमि पर नीचे आ गिरा।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥